
लालू यादव के रेल मंत्री रहते हुए रेलवे के टेंडर आबंटन में हुई गड़बड़ियों के संबंध में उनके पटना स्थित आवास पर सीबीआई का छापा पड़ा. इस मामले में उनके बेटे, उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को भी अभियुक्त बनाया गया है. और इसके साथ ही यह कयास लगने लगे कि क्या तेजस्वी यादव को इस्तीफा देना पड़ेगा? अब नीतीश कुमार क्या करेंगे? तेजस्वी यादव से इस्तीफा लेंगे? राजद से गठबंधन तोड़, बीजेपी के साथ हो लेंगे? आज बिहार का राजनीतिक गलियारा इन्ही यक्ष सवालो से पटा पड़ा है. और ये सारे सवाल नीतीश कुमार के बयान आने तक खड़े रहेंगे, क्योंकि कुछ दिनों से महागठबंधन में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है. सीबीआई के छापे के पहले जदयू का सहयोगी दलों से राष्टपति उमीदवार मीरा कुमार को समर्थन को लेकर अनबन चल रहा था. राजद और जदयू के बीच खूब बयानबाजी चल रही थी. लेकिन नीतीश कुमार के बयान आने के बाद कि महागठबंधन अटूट है, बयानवाजी बंद हुई.
सीबीआई के छापे के पहले जदयू का सहयोगी दलों से राष्टपति उमीदवार मीरा कुमार को समर्थन को लेकर अनबन चल रहा था. राजद और जदयू के बीच खूब बयानबाजी चल रही थी. लेकिन नीतीश कुमार के बयान आने के बाद कि महागठबंधन अटूट है, बयानवाजी बंद हुई.
फिर पिछले हफ्ते सूबे के शिक्षा मंत्री, शिक्षा विभाग के कार्यक्रम में शिरकत करने के बजाए दिल्ली चले गए. इतना ही नहीं, मंगलवार को गांधी मैदान में होने वाले मुख्यमंत्री विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम,जिसमें नीतीश कुमार शिरकत करने वाले थे, उसको भी छोड़ अशोक चौधरी सोमवार को दिल्ली चले गए. इधर नीतीश कुमार ने न केवल गांधी मैदान के कार्यक्रम में जाना रद्द किया, बल्कि उसके बाद स्वास्थ का हवाला दे कर मौन धारण कर लिए. ऐसे में संभवततः लालू यादव के यहाँ पड़ने वाले सीबीआई छापे की जानकारी मिलते ही सवालों से बचने के लिए वे राजगीर प्रस्थान कर गए. जो इस बात पर बल देता है कि महागठबंधन में चल रहा शीत युद्ध अभी भी शान्त नहीं हुआ है.
तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग महागठबंधन को खतरे में डाल सकता है. नीतीश कुमार, इस मामले की गंभीरता को बखूबी समझ रहे हैं, सीबीआई के छापे के तीसरे दिन तक उनकी चुप्पी इसी बात का संकेत है. इसका एक कारण यह है कि अगर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तेजस्वी यादव के इस्तीफे को लेकर यदि उनका निर्णय राजद को मान्य न हो तो गठबंधन टूट सकता है. और शायद उनकी खामोशी का यह संकेत भी है कि नीतीश जी संभवतः ऐसा नहीं चाहते हैं.
सांप्रदायिकता के मुद्दे पर नीतीश कुमार के बीजेपी से अचानक अपना 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ने के कारण ही आज यह कयास लगाया जा रहा है कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार से घिरे राजद से भी संबंध तोड़ लेंगे. क्योंकि आज भी बीजेपी यह चाहती है कि विकास के मुद्दे पर नीतीश कुमार फिर साथ आ जाये. लेकिन क्या ऐसा होने की संभावना है? बीजेपी के लोकसभा 2014 में जीत के बाद देश मे परिस्थितियां बहुत तेजी से बदली है. जब नीतीश कुमार ने बीजेपी से अपना संबंध तोड़ा उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी और आज नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है. वहीं मोदी सरकार के आने के बाद, पिछले तीन साल में देश मे सांप्रदायिक घटनाएँ बढ़ गई है. देश भर में जगह-जगह गाय के नाम पर अल्पसंख्यको की हत्याएं हो रही है. गाय के नाम पर अखलाक की हत्या से शुरू हुआ यह खेल ‘मॉब लिंचिंग’ का रूप ले चुका है.
सांप्रदायिकता के मुद्दे पर नीतीश कुमार के बीजेपी से अचानक अपना 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ने के कारण ही आज यह कयास लगाया जा रहा है कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार से घिरे राजद से भी संबंध तोड़ लेंगे. क्योंकि आज भी बीजेपी यह चाहती है कि विकास के मुद्दे पर नीतीश कुमार फिर साथ आ जाये.
यह बात ध्यान देने लायक है कि भाजपा बिहार में सत्ता में नहीं है. फिर भी बिहार जैसे सामाजिक व राजनैतिक रूप से सशक्त राज्य में सांप्रदायिक सदभाव बिगाड़ने के प्रयास पिछले कई सालों से तेज़ हो गए हैं. आज सूबे के कई जिलों से सांप्रदायिक घटनाओं की खबर आती रहती हैं. अमूमन शांत रहने वाले छपरा में भी सांप्रदायिक गतिविधि बढ़ गई है, जहाँ प्रत्येक महीने 2 से तीन घटनाएँ सांप्रदायिक रूप ले ले रही हैं. पिछले दिनों एनडीटीवी के मुस्लिम पत्रकार मुन्ने भारती को ऐसे ही असामाजिक तत्वों का सामना करना पड़ा, जहाँ उन्हे, “जय श्री राम” का नारा लगाने को कहा गया, वरना परिवार समेत गाड़ी में आग लगाने की धमकी दी गई. जिसकी निंदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की. वही इन सांप्रदायिक घटनाओं पर प्रधानमंत्री की चुप्पी देश में सम्प्रदायिक घटनाओं को और बढ़ावा दे रही है. अमूमन देश में हो रही किसान, दलित हत्याओं तथा मॉब लिंचिंग के नाम पर हो रही हत्याओं पर खामोश रहने वाले प्रधानमंत्री, जब अमरनाथ यात्रा की घटनाओं पर शोक ब्यक्त करते हैं तो प्रधानमंत्री स्वयं को कठघरे में खड़ा कर लेते हैं. आज देश जो सांप्रदायिक माहौल है, उसको देखते हुए, कभी नरेंद मोदी के नाम पर गठबंधन तोड़ने वाले नीतीश का फिर से बीजेपी में वापसी की संभावना नहीं लगती है.
महागठबंधन बनने के बाद से ही बीजेपी लगातार लालू यादव के बहाने नीतीश कुमार पर हमला करती रही है. कभी चारा घोटाला में सजा प्राप्त लालू प्रसाद यादव से हुए गठबंधन पर नीतीश कुमार की नैतिकता पर सवाल उठाए जाते है. लेकिन आज प्रदेश की भाजपा इकाई में जगन्नाथ मिश्र के पुत्र समेत दर्जनों बिधायक ऐसे जिनके परिवार के सदस्य या परिजन चारा घोटाले में सजा प्राप्त कर चुके हैं. इसको लेकर कोई प्रश्न नहीं उठता कि पानी पी पीकर कोसने वाली भाजपा की केन्द्रीय और राज्य इकाई किस नैतिकता के तहत इनकों टिकट दी और कौन से धाम का जल छिड़क कर उन्हें पवित्र कर दी है?फिर प्रश्न उठता है कि पिछले विधान-सभा चुनाव में सबसे ज्यादा अपराधी किस्म के लोगों को टिकट देने वाली भाजपा किस नैतिकता के तहत, राज्य में बढ़ते अपराध को लेकर लालू प्रसाद को जिम्मेबार ठहरा कर नीतीश कुमार पर दबाव बना रही है?
लालू यादव के घर पर पड़े सीबीआई का छापा महागठबंधन पर हो रहे हमलो का एक हिस्सा है. ऐसी परिस्थिति में नीतीश कुमार बीच का रास्ता क्या निकलते हैं, वह देखना होगा. क्योंकि नीतीश कुमार ना तो बाजेपी से वापस गठबंधन कर अपने सेक्युलर छवि को खराब करना चाहेंगे और ना ही फिर से अकेले चुनाव में कूदना चाहेंगे.
लालू यादव के घर पर पड़े सीबीआई का छापा महागठबंधन पर हो रहे हमलो का एक हिस्सा है. ऐसी परिस्थिति में नीतीश कुमार बीच का रास्ता क्या निकलते हैं, वह देखना होगा. क्योंकि नीतीश कुमार ना तो बाजेपी से वापस गठबंधन कर अपने सेक्युलर छवि को खराब करना चाहेंगे और ना ही फिर से अकेले चुनाव में कूदना चाहेंगे. संभवतः इसके लिए नीतीश कुमार कांग्रेस और लालू यादव से इसकी चर्चा कर आगे का रास्ता निकालने का प्रयास करेंगे. राजनीति में नैतिकवाद कम अवसरवाद का खेल ज्यादा होता है. ऐसे में नीतीश कुमार के निर्णय में किसका वजन ज्यादा होगा, देखना शेष है.
लेखक: गौरव अरण्य स्वतंत्र पत्रकार हैं. आपने पटना यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त किया है और बिहार के राजनितिक एवं सामाजिक घटनाक्रम पर बारिक नज़र रखते हैं.









