
मंदसौर से शुरू हुई किसान मुक्ति यात्रा, चार हजार किमी का सफ़र तय करके 18 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर किसान मुक्ति संसद के रूप में प्रकट हुई|जिसमें लगभग दो सौ किसान संगठनों ने भागीदारी की| इस संसद को किसानों का भरपूर समर्थन तो मिला ही, साथ ही यह संसद और भी कई मायनों में अभूतपूर्व रही।सबसे पहले तो कई साल के बाद विभिन्न राज्यों में कार्यरत किसान संगठन अपने सक्रिय कार्यकर्ताओं के साथ जंतर-मंतर पर एक साथ पहुंचे|जो सत्ता में बैठे लोगों को किसान संगठनों में निहित एकता के सन्दर्भ में कोई टिप्पणी का मौका नहीं दिया| साथ ही इस संसद में सीटू जैसे मजदूर संगठनों के नेता और कार्य-कर्ता की उपस्थिति इस आन्दोलन के दूरगामी सोच की परिचायक बनी | आगे नर्मदा बचाओ आन्दोलन से जुड़े आदिवासियों और विश्वविद्यालय में सक्रिय सगठनों ने भी अपनी सक्रियता दर्ज कराई| तो इस आन्दोलन में किसान, मजदूर, आदिवासी जैसे कई रंगों का समागम एक साथ हुआ| जो एक परिपक्व सोच का नतीजाहै क्योंकि अलग-अलग आवाज उठाने से सरकार अलग-अलग सभी संगठनों से आसानी से निपट लेती|जैसे हरियाणा में मजदूर आंदोलन को कुचल दिया गया और फिर मध्य-प्रदेश तथा महाराष्ट्र में किसान आन्दोलन का जैसे उपहास हुआ और सरकार की दमनकारी नीतियों के भेट चढ़ा, उसको देखते हुए इस आन्दोलन में कई रंगों का समाहित होना समय की जरूरत भी थी|

किसान नेताओं के साथ-साथ इस किसान-मुक्ति संसद में केरल के सांसद पी. करुणाकरण,शिवसेना के सांसद अरविंद सावंत, जेडीयू के सांसद अली अनवर और शरद यादव के साथ-साथ भाजपा के बागी सांसद राजू शेट्टी तथा सीताराम येचुरी ने किसान मुक्ति संसद पहुँचकर किसानों की माँगों का समर्थन तो किया ही, इससे आगे केंद्र की सत्ता में काबिज सरकार को किसान विरोधी कहा और साथ ही जालिम सरकार और माइकल उडवायर की सरकार की भी संज्ञा दे दी|
सत्ता में काबिज सरकार को किसान विरोधी कहा और साथ ही जालिम सरकार और माइकल उडवायर की सरकार की भी संज्ञा दे दी|
भीड़ से उत्साहित किसान नेताओं ने सरकार को ईट का जबाब पत्थर से देने की चेतावनी भी दे डाली| आगे उपस्थित किसान नेताओं ने ये भी सन्देश दिया कि जैसे ही हम किसान समन्वय समिति बनाकर किसान मुक्ति यात्रा की घोषणा किये, सत्ता में बैठे लोग घबरा गये| परिणाम-स्वरुप कृषि क्षेत्र में उपयोग होने वाली खाद, दवा समेत और भी कई चीजों को सरकार ने जी एस टी के दायरे से बाहर किया| जिसे नेताओं ने इस आन्दोलन की सफलता के रूप में पेश किया| किसान नेताओं के ही माध्यम से इस बात की जानकारी मिली कि ये तो किसान मुक्ति यात्रा का पहला पड़ाव है| अगले दौर में ये आन्दोलन भारत के दक्षिण राज्यों में जायेगा और अपने अंतिम दौर में यात्रा उत्तर प्रदेश से होते हुए बिहार जायेगा| और दो अक्टूबर (गांधी जयन्ती) को बिहार के चम्पारण जिले में इस यात्रा का अंतिम पड़ाव होगा|चम्पारण का किसानों की एकता और संघर्ष के लिए एतिहासिक महत्त्व है जिसने गांधी जैसे महानायक को राष्ट्रीय क्षितिज पर आविर्भाव होने में एक महत्वपूर्ण फलक प्रदान किया| इसके माध्यम से किसान हित में चम्पारणके ऐतिहासिक महत्व की चर्चा होगी और साथ ही इस बात पर चर्चा होगी कि कैसे हमारी लोकतान्त्रिक सरकार देश किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर रही है| क्या ये सरकार चम्पारण और बरदोली के किसानों के संघर्ष और बलिदान को भूल गयी है? अगर इस आजाद देश में किसान को गोली मारी जाती है तो फिर आजादी और गुलामी में क्या फर्क है? इस तरह से किसान आन्दोलन को एक नई ऊंचाई देने की पहल होगी|उसके बाद ये आन्दोलन फसलों का उचित दाम (स्वामी नाथन योग के अनुसार डेढ़ गुना दाम) और किसान को क़र्ज़ मुक्त करने का दबाव सरकार पर बनाएगा|
अगले दौर में ये आन्दोलन भारत के दक्षिण राज्यों में जायेगा और अपने अंतिम दौर में यात्रा उत्तर प्रदेश से होते हुए बिहार जायेगा| औरदो अक्टूबर (गांधी जयन्ती) को बिहार के चम्पारण जिले मेंइस यात्रा का अंतिम पड़ाव होगा|चम्पारण का किसानों की एकता और संघर्ष के लिए एतिहासिक महत्त्व है जिसने गांधी जैसे महानायक को राष्ट्रीय क्षितिज पर आविर्भाव होनेमें एक महत्वपूर्ण फलक प्रदान किया|
उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के कार्यकताओं से बात करने के बाद पता चला कि भले ही सूबे के मुख्य-मंत्री आलू की न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करके अपने सरकारी महकम्मा को खरीददारी का आदेश पारित कर दिए हों लेकिन ऐसे करने सेआलू किसान को राहत दिलाने में बिलकुल असफल रहे हैं| परिणामस्वरुप आगरा और मथुरा से क़र्ज़ के बोझ तले किसान आत्महत्या की खबर मीडिया के माध्यम से आयी|आलू उपजाने वाले किसान, राजेंद्र राना के घर में आज भी 1500 क्विंटल आलू रखी है।क्योंकि सरकार आलू खरीद में अक्षम है। और आलू की बिक्री न होने की वजह से उनके पिता का हार्ट-अटैक हो गया।उनकी मौत के लिए सरकार जिम्मेदार है।क्योंकि योगी सरकार की नीति किसानों के हित में होती और सरकार की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होता तो राजेंद्र राना के पिता जी का दिल का दौरा नहीं पड़ता| आलू किसानों की व्यथा के सामान ही गन्ना किसानों की भी हालत है| मेरठ के किसानों ने बताया कि सरकार की लाख कोशिश के बावजूद भी चीनी मिल किसान को भुगतान नहीं कर रही हैं| कर्ज-माफी की बात करने से पता चला कि सरकार की नियम और शर्तों के अनुसार 1% किसानों का भी कर्जा माफ़ नहीं हुआ| इस तरह से सरकार ने किसान के साथ वादा-खिलाफी का काम किया है|

मंच के माध्यम से महाराष्ट्र के मृतक किसानों के परिवार-जनों की पीड़ा भी छलकी| जिनकी सहायता में कुछ सामाजिक संगठन और राजनीतिक लोग आगे आये हैं| लोग आश्रम विद्यालय के माध्यम से मृतक किसानों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की व्यस्था किये हैं| ये बच्चे अपनी छोटी सी उम्र में समूह बनाकर आस-पास के गाँव में जाते हैं| और क़र्ज़ तले दबे निराश हताश किसानों को लड़ाई लड़नेका हौसला देते हैं और आत्म-हत्या जैसे रास्ते को न चुनने के लिए कहते हैं| लेकिन दूसरी तरफ सरकार पूंजीपति और बड़ी कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों को कुचलने पर उतारू है| इसके बाद भी जनसँख्या का लगभग आधी हिस्सेदार और खेती-किसानी का दो तिहाई काम करने वाली महिलाओं ने इस आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया| जिनकी भारी तादाद में उपस्थिति के कारण किसान मुक्ति संसद ऐतिहासिक रही। ऐसे में किसान नेता ये नारा क्यों न लगाते कि“सरकार के पास है न जबाब किसानों की मांगे लाजबाब”| शोषण अगर इस सरकार का विशेषाधिकार है तो आन्दोलन हमारा संवैधानिकअधिकार है| इसलिए दो अक्टूबर के बाद हम अपना हक़ माँगेंगे नहीं, छिन कर लेंगे|
मंच के माध्यम से महाराष्ट्र के मृतक किसानों के परिवार-जनों की पीड़ा भी छलकी| जिनकी सहायता में कुछ सामाजिक संगठन और राजनीतिक लोग आगे आये हैं| लोग आश्रम विद्यालय के माध्यम से मृतक किसानों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की व्यस्था किये हैं| ये बच्चे अपनी छोटी सी उम्र में समूह बनाकर आस-पास के गाँव में जाते हैं| और क़र्ज़ तले दबे निराश हताश किसानों को लड़ाई लड़नेका हौसला देते हैंऔर आत्म-हत्या जैसे रास्ते को न चुनने के लिए कहते हैं|
लेखक: शैलेश, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं और किसान के मुद्दे पर अध्ययनरत है.









