
ये कहानी न तो लिपस्टिक के बारे में है,न ही बुर्के के बारे में।क्यूंकि ये दोनों न भी हो ,तो भी सच्चाई नही बदलती।
“रोज़ी” नाम के किताबी पात्र में चार महिलाओं की कहानी समा गई है।बात भोपाल की है,पर उसे किसी भी गाँव या शहर में आज़मा के देखा जा सकता है।आप इन ४ महिलाओं के ज़रिये बहुत कुछ जान-समझ सकते हैं।जैसे एक महिला के यौन अधिकार किस तरह रोज़ रात बिस्तर पे टूट जाते हैं।साथ ही,औरत के सेक्स करने की इच्छा भी उसके व्यक्तित्व का हिस्सा है, उतना ही जितना लिपस्टिक या बुर्का।फिल्म के दौरान महिलाओं को उनकी ही इच्छाओं से रूबरू होते देख आपको अचरज और हर्ष दोनों हो सकता है।
फिल्म दर्शक को उसकी धारणाओं से बाहर भी ले जाती है। हम हमेशा क्यूँ किसी भी लड़की या औरत को एक धारणा के तहत ही देखते हैं (ये बात हर व्यक्ति पर लागू होती है)? हमारा दिमाग पहले ही सोच लेता है कि कोई महिला अपने खाली समय में क्या करती होगी,किस तरह का म्यूजिक पसंद करती होगी या उसका पेशा क्या होगा। एक और बात ये है जो ये फिल्म बखूबी तरह से दर्शाती है।वो बात ये है कि महिलाएँ एक गुप्त जीवन जीती हैं।ये जीवन उनके अपने परिवार से और समाज से छुपा रहता है। ऐसे गुप्त जीवन में वो अपनी इच्छाओं को जीती है, कभी लिपस्टिक कभी बुर्के के सहारे।
एक सच तो ये भी है कि हम एक समाज के रूप में लिपस्टिक और बुर्के दोनों से डरते हैं। देखा जाए तो ये फ़िल्म ऐसे बहुत से नकाब हटा कर औरत को पेश करती है। एक लड़की, औरत या महिला अल्हड़ है,बेबाक है और महत्त्वाकांक्षी है । वो हमेशा बहन,बेटी,बीवी,बुआ औऱ माँ जैसी मूर्ति नही है, जो सुबह से शाम में एक अच्छा किरदार निभाती रहे।उसे हमे नारी के रूप में पूजना छोड़ना होगा। ये उसे एक अमानवीय रूप देता है और हम फिर सच से मुँह फेरने लगते है।आपको ये अच्छा या बुरा जैसा भी लगे पर ये सच है। फिल्म देखने के बाद नारी सशक्तिकरण की बात या उसकी वकालत न करें।उसकी ज़रूरत नही है।और हाँ ,औरत भी गलत है ऐसे कई नमूने फ़िल्म में सामने आते हैं।
वो हमेशा बहन,बेटी,बीवी,बुआ औऱ माँ जैसी मूर्ति नही है, जो सुबह से शाम में एक अच्छा किरदार निभाती रहे।उसे हमे नारी के रूप में पूजना छोड़ना होगा। ये उसे एक अमानवीय रूप देता है और हम फिर सच से मुँह फेरने लगते है।आपको ये अच्छा या बुरा जैसा भी लगे पर ये सच है।
किसी लड़की को पढने भेजा जा रहा है पर ये उसकी आज़ादी नही है, किसी के पास घर परिवार में बुआ होने का रुतबा है पर ये उसकी आज़ादी नही, किसी के पति और बच्चे हैं पर ये उसकी आज़ादी नही,किसी के पास अच्छी शादी का रिश्ता है पर ये उसकी आजादी नही।शायद इसलिए ये सब आज़ादी नही क्यूंकि ये “आज़ादी” हमे दी गयी है।और आज़ादी कोई तौफा नही जो किसे के जन्मदिन पर उसे भेंट किया जा सके।इस फ़िल्म में ऐसा कुछ नही दिखाया या कहा गया जो सच न हो।पर अब सच आपको लगता कैसा है ये तो आप ही बेहतर जाने। फ़िल्म की कमियाँ अपनी जगह है।फिल्म का अंत एक उलझन है।पर शायद ये अंत भी सच है।
लेखक: पूर्णिमा नारंग, एक सक्रिय ब्लॉगर हैं|









