
आप अपने आस पास अक्सर निर्माण कार्य मे लगे मजदूरों को देखते होंगे | यदि आप सुबह जल्दी जागने वालो मे से है तो यकीनन आप ने अपने घर के आस पास चौराहे पर टोलियों मे बैठे मजदूरों को देखा होगा| ऐसे जगह को हम आम बोल चाल की भाषा मे “लेबर चौक “ से संबोधित करते है| यहाँ मजदूर सुबह सात बजे तक खा-पीकर काम की तलाश मे पहुच जाता है | एक समय तक काम का इंतेजार करता है , यदि काम मिल गया तो खुश होकर काम पर चला जाता है अन्यथा मायूस होकर घर को लौट जाता है| सरकारी आँकड़े बताते है कि हमारे देश मे कृषि के बाद सबसे जायदा लोग निर्माण कार्यो मे काम करते हैं| निर्माण कार्य जैसे- मकाने का निर्माण, पूल निर्माण , सड़क निर्माण जैसे कामो को इसमें सम्मिलित किया गया है |
यह जानकर आपको कोई हैरानी नहीं होगी कि केवल दिल्ली मे लगभग आठ लाख निर्माण मजदूर रहते हैं, जिनका रोजगार सिर्फ कंस्ट्रक्शन साईट पर मजदूरी का काम करना है| साल के कुछ महीने मकानों मे, सडको पर काम करते हैं और वापस घर को लौट जाते है | पर कई बार इन मजदूरों का किस्मत धोखा दे जाता है और खतरों के बीच काम करना बहुत बार उनके लिए जानलेवा साबित होता है| कई ऐसे सरकारी एवं गैर सरकारी रिपोर्ट्स है जैसे कि दिल्ली स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क सोसाइटी की 2009 की रिपोर्ट एवं अर्जुन सेन गुप्ता समिति की रिपोर्ट जो निर्माण कार्य मे लगे मजदूरों की व्यथा को बहुत ही विस्तार से हमारे सामने रखती है| अर्जुन सेन गुप्ता समिति की रिपोर्ट यह बताती है कि 92% काम करने वाले लोग असंगठित छेत्र मे काम करते है और केवल 8% लोग ही संगठित छेत्र मे काम करते है | यही 8 % संगठित क्षेत्र के लोगो को सामाजिक सुरक्षा से संबधित लाभ मिलते है | कमिटी की रिपोर्ट यह भी कहती है की 76 % असंगठित छेत्र के मजदूर 20 रूपए प्रति दिन पर गुजर बसर कर रहे हैं |
निर्माण कार्य मे लगे मजदूरों की ऐसी व्यथा के कारण ही कुछ लोग एवं संस्थाए आगे आकर इनके लिए कुछ करने की ठानी | ऐसे ही कुछ लोग है न्याय मूर्ति वी .आर. कृष्ण अय्यर, आर . गीता जी, सूभाष भटनागर जी, आर . वेंकटरमणी एवं अन्य | इनके प्रयसो एवं लाखो मजदूरों की सालो के आन्दोलन के बाद भारत सरकार ने “भवन एवं अन्य संनिर्माण नियम 1996 (The Building and Other Construction Workers Act)” एवं “भवन एवं अन्य संनिर्माण सेस नियम 1996 (The Building and Other Construction Workers Cess Act)” पारित हुआ है| कानून के तहत हरेक राज्यों मे मजदूर कल्याण बोर्ड बनने की बात कही गयी है| यही मजदूर कल्याण बोर्ड अपने राज्यों मे हो रहे निर्माण कार्यो से 2 % अधिकतम जायदा एवं 1 % न्यूनतम अधिकर के रूप मे निर्माण के कीमत का वसूल करेगी और यही पैसा मजदूरों के सामाजिक एवं आर्धिक कल्याण मे लगाया जायेगा ! अगर देखा जाये तो कुछ राज्यों को छोड़ दे तो लगभग सभी राज्यों ने इसे अपने यहाँ लागू किया है | यदि हम आँकड़ो पर गौर करें तो हमें सरकारों मे बैठे बाबू लोगो के मंसूबो का देश के गरीबो के प्रति क्या है, इसका एक जीता जगता उदहारण मिलता है|केरल केवल अकेला राज्य है जिसने अपने मजदूर कल्याण बोर्ड मे जमा हुआ राशि का 94.51% मजदूरों के कल्याण मे खर्च किया| आँकड़े बताते है कि मार्च 31, 2016 तक मजदूर कल्याण बोर्ड मे 26000 करोड़ से ज्यादा की राशी जमा की गयी| जमा किये गये राशि मे से केवल 21 % यानी 5684 करोड़ राशि ही खर्च की गई|
केरल केवल अकेला राज्य है जिसने अपने मजदूर कल्याण बोर्ड मे जमा हुआ राशि का 94.51% मजदूरों के कल्याण मे खर्च किया| आँकड़े बताते है कि मार्च 31, 2016 तक मजदूर कल्याण बोर्ड मे 26000 करोड़ से ज्यादा की राशी जमा की गयी| जमा किये गये राशि मे से केवल 21 % यानी 5684 करोड़ राशि ही खर्च की गई|
इन पीछे के कारणों को समझने के लिए जब न्यायालयों मे अर्जी लगाई गई तो ऐसे-ऐसे तथ्यों का पता चला जो और चौकाने वाले थे| एक ऐसी ही पी.आई .एल नेशनल कमिटी फॉर सेंट्रल लेजिस्लेशन के द्वारा दायर किया गया| इसके जवाब मे सरकार एवं उसके एजेंसी यह कहती है कि राज्यों के पास इसका कोई हिसाब ही नहीं है कि मजदूरों के लिए जमा किया गया 20,000 करोड़ से ज्यादा की राशी कहा गई| हाल ही मे सर्वोच न्यालय मे सुनवाई के दौरान भारत सरकार को कई कठोर निर्देश दिए गये हैं|
एक तरफ परिस्थिति यह है कि निर्माण मजदूर हर रोज मर रहे है और गरीबी मे जीने के लिए मजबूर है और दूसरी तरफ इतनी राशि वर्षो से खातो मे ऐसे ही पड़ी है| इसका कोई हिसाब सरकारों के पास नहीं है कि पैसा कहा गया| क्या यह पैसा राजनितिक पार्टियों द्वारा अन्य कामो मे लगाया गया, जैसा की दिल्ली सरकार ने अपने यहाँ दिल्ली मजदूर कल्याण बोर्ड मे जमा हुए 1536 करोड़ मे से 900 करोड़ को अन्य कामो के लिए खर्च किया, पर सरकार यह भूल गयी कि यह पैसा मजदूरों का है , उनके परिवार के भविष्य के लिए है, इस देश के भविष्य के लिए है, न कि सरकार मे बैठे असंवेदंशील राजनेता और बाबू लोगो की झूठे कामो के लिए है|
दिल्ली निर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड के द्वारा मजदूरों के सामाजिक और आर्धिक कल्याण के लिए कई सारे बेमिसाल योजनाये है जो यकीनन मजदूरों के मुश्किल वक़्त मे एक सहारा बन सकता है, यही इस कानून का उद्देश्य भी था| दिल्ली निर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड से पंजीकृत निर्माण मजदूरों को निम्न लाभ मिलता है|
मातृत्व लाभ (नियम 271) 30000/-
गर्भपात 3000/-
पेंशन 3000/–15600/- मासिक तक
(हर साल के पंजीकरण पर 300 रुपये बढ़ोतरी)
मकान बनाने के लिए लोन (45 वर्ष की आयु तक) 5,00,000/-
सदयस्ता के तीन वर्ष बाद (50 वर्ष की आयु तक) 3,00,000/-
विकलांगता पेंशन 3000/-
औजार खरीदने के लिए लोन 20,000
अंतिम संस्कार 10,000
विवाह सहयता 51000
छात्रवृति:-
कझा 1-8 तक 500 प्रति महीने
कझा 9 -10 तक 700 प्रति महीने
कझा 11 -12 तक 1000 प्रति महीने
ग्रेजुएशन लेवल पर 3000 प्रति महीने
निर्माण मजदूरों के एक अंधकारपूर्ण भविष्य मे यक़ीनन कल्याण बोर्ड की यह योजनायें कुछ रोशनी की किरण देती है , पर असंबेदनशील एवं भ्रष्ट सरकारे यह कतई नहीं देखना चाहती है कि आम आदमी आगे बढे, उसके बच्चे पढ़े और देश को एक गौरवशाली राष्ट के रूप मे पहचान मिले |
लेखक- रोहित भारती, दिल्ली स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क (DSSW), नई दिल्ली में रिसर्च फेलो हैं और निर्माण-मजदूर पर शोध कर रहे हैं|









