Home Politics कानून-व्यवस्था के साथ भाजपा की आँख-मिचौली

कानून-व्यवस्था के साथ भाजपा की आँख-मिचौली

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2014 के आम चुनाव के घोषणा-पत्र में और उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा द्वारा जारी किये चुनावी-पत्र में कानून व्यवस्था एक अहम मुद्दा था. साथ ही उत्तर प्रदेश की कानून वयस्था को पटरी पर लाने के लिए एक व्यापक रूप-रेखा भी प्रस्तुत किया गया. लेकिन केंद्र सरकार के लगभग तीन साल और 4-5 महीने के कार्यकाल में हुए अपराध की घटना को देख कर यहीं लगता है कि ये दस्तवेजी पुलिंदा सिर्फ दिखावटी प्रदर्शनी है. जिसका जन-कल्याण और जन-समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है.

जब से केंद्र में भाजपा की सरकार बनी है तब से देश में मोब-लिंचिंग, गौ-रक्षक दल द्वारा दलितों और अकलियत के लोगों पर हमले बढे हैं.और बात-बात पर ट्विट करने वाले स्वाभिमानी हिन्दू प्रधान मंत्री की इन घटनाओं पर खामोशी उनकी संवेदनहीनता की ओर इशारा करती हुई नजर आयी. उत्तर प्रदेश का विधान-सभा चुनाव ने गुजरात की उन्ना की घटना पर प्रधान-मंत्री को अपना चुप्पी तोड़ने के लिए मजबूर की. जो सार्वजनिक मंच से घोषणा करते हुए नजर आये कि अगर मारना है तो मुझे मार दो लेकिन मेरे दलित भाइयों को मत मारो. प्रधान-मंत्री जी का ये लचीला रूख उनकी संकल्पनाऔर संवेदनाशीलता की कमी को जाहिर करता है क्योंकि सरकार के कुछ अधिकार और विशेषाधिकार है जिसके माध्यम से जनता की हितों की रक्षा करती है. सरकार कोई अनाथालय या असहाय नहीं है जो चाहे अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करे या अपनी मकसद तक पहुँचने के लिए औरो के सामने हाथ जोड़ कर नतमस्तक होता रहे. अगर प्रधान-मंत्री के अन्दर अगर सुदृढ़-संकल्पना होती तो वे कहते कि कुछ भी हो जाए हम दलितों, औरअक्लियत के लोगों पर हम हमला नहीं होने देंगे. लेकिन प्रधान-मंत्री जी ऐसा कठोर कदम क्यों उठायें? हमलावर तो उन्ही के पितृ-संगठन से सम्बन्ध रखने वाले हैं.उनका भातृ प्रेम ही उनकी लचर रवैया का कारण है. साथ ही पीड़ित लोगों के साथ कोई सहानुभूति न दिखाकर प्रधानमंत्री जी अपनी संवेदनहीनता करने का काम करते हैं.उत्तर प्रदेश की नई सरकार से भी कोई उम्मीद पालना मुंगेरी लाल के हसीन सपने से कम नहीं है. क्योंकि मुख्यमंत्री जी शपथ लेने के तुरंत बाद साफ़-साफ़ शब्दों से बता दिए थे कि सूबे की नई सरकार भी केंद्र सरकार का अनुशरण करते हुए प्रदेश का चहुमुखी विकास करेगी. लेकिन सरकार गठन के साथ ही सहारनपुर, मुज्ज़फरनगर में दलितों पर हमलें हुए जिसमें सांसद और विधायक तक शामिल पाए गये, प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं और व्यापारियों की हत्या, और डकैती जैसी संगीन वारदातें हुई उससे ये बात प्रमाणित हो गया कि प्रदेश सरकार भी केंद्रका अनुशरण करते हुए हिन्दुत्ववादी गुंडों और सगंठनों को अपनी मनमर्जी करने और कानून से खेलने की भरपूर छूट देगी. जैसा की एंटी-रोमिओ स्क्वाड, घर-वापसी, लव-जिहाद जैसे मुद्दों पर हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ताओं को कानून के साथ खेलने की प्रवृति से पता भी चला.

सरकार गठन के साथ ही सहारनपुर, मुज्ज़फर-नगर में दलितों पर हमलेंहुए जिसमें सांसद और विधायक तक शामिल पाए गये, प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं और व्यापारियों की हत्या, औरडकैती जैसी संगीन बरदातें हुई उससे ये बात प्रमाणितहो गया कि प्रदेश सरकार भीकेंद्रका अनुसरण करते हुए हिन्दुत्ववादी गुंडों और सगंठनों को अपनी मनमर्जी करने और कानून से खेलने की भरपूर छूट देगी. जैसा की एंटी-रोमिओ स्क्वाड, घर-वापसी, लव-जिहाद जैसे मुद्दों पर हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ताओं को कानून के साथ खेलने की प्रवृति से पता भी चला.

उप्र के मुख्यमंत्री भले ही अपराधी प्रवृति के लोगों को जेल और प्रदेश छोड़ने की बात करके अपराधी और उपद्रवी किस्म के लोगों को अपनी स्थिति सुनिश्चित करने की बात कर रहे हों. लेकिन पुलिस कर्मचारियों पर भाजपा, आरएसएस, बजरंग दल, हिन्दू युवा वाहिनी के कार्य-कर्ताओं का हमला, तथा बी. चन्द्रकला एवं श्रेष्ठा सिंह जैसे कुशल प्नशासनिक और पुलिस अधिकारी का तबादला ने सूबे के प्नशासनिक महकमा और पुलिस बल के मनोबल ओर आत्म-विश्वास को तोड़ने का काम किया. दूसरी और हिन्दुत्ववादी उपद्रवियों को और उग्र बनाने के काम किया. इससे जनता में सन्देश गया कि सरकार की कथनी और करनी में कोई सम्बन्ध नहीं है. परिणाम स्वरुप आये दिन सूबे में हत्या, बलत्कार, चोरी, डकैती,दंगा-फसाद जैसी अपराधिक घटनाएँ दिन-प्रतिदिन श्रृखला-बद्ध तरीके से हो रही है.

तड़ीपार सहित कई मुकद्दमों का दंश झेल रहे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह चुनाव-प्रचार के दौरान कई बार सार्वजनकि मंच से स्कूल जाती बच्चियों की चिंता प्रकट किये. साथ ही मनचलों को सबक सिखाने के लिए पेड़ से उल्टा लटका कर सबक सिखाने की बात किये थे. राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद ऐसी ही छेड़-छाड़ के मामले में फंसे है दूसरों को क्या सन्देश देंगे? योगी जी के कई मामले इलाहाबद हाई कोर्ट में और निचली आदालतों में लंबित है. वो अपने द्वरा बताये गये दोनों जगहों में से कौन सी जगह उपयुक्त पाते हैं? अभी हाल चंडीगढ़ में वर्णिका कुंडू के साथ हरियाणा भाजपा अध्यक्ष के बेटे क्या सुलूक किया? इसके बावजूद भी कड़ी कार्यवाही की जगह पर मामले की लीपापोती करनी की कोशिश की गयी.उप्र के बलियाजिले के सदर क्षेत्र में रागिनी दुबे हत्या कांड हुआ. उचित समय पर मामले को पुलिस-प्रशासन के संज्ञान में लाकर हादसे को टालाजा सकता था. पर इस सरकार का तो संविधान में, कोर्ट में,सामाजिक संस्थानों में तो कोई विश्वास है नहीं. देश/प्रदेश को घरेलू तरीके से चलाने की कोशिश हो रही है. इसी घरेलु नुक्से के कारण छात्रा डरसे लगभग तीन महीने तक अपने घर में दुबकी रही और रक्षा-बंधन के बाद स्कूल के लिएनिकली तो गाँव के बाहर ही भाजपा के एक दबंग नेता के बिगडैल पुत्र ने चाकू भोक कर छात्रा की निर्मम हत्या कर दी. जिसके चलते अगल-बगल में भय का माहौल बना हुआ है. ऐसे में बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ की नीति को सरकार कैसे सफल बनायेगी? प्रधानमंत्री जी को अपने मन की बात के माध्यम देश को बताना चाहिए.उत्तरप्रदेश के उर्जा मंत्री का सदर विधायक के अलावा जिले के किसी और विधायक के साथ पीड़ित परिवार के पास जाना भी अपने आप में कई सवाल खड़ा करता है. सदर विधायक का दोषी परिवार के साथ सम्बन्ध भी जग जाहिर है. सदर विधायक न जाकर मामले में शामिल दोषी शामिल लोगों की सहानुभूति हासिल करना चाहते हैं. केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकार कीएक बात बहुत ही सामान्य है कि अपनी गलती को छुपाने के लिए अपनी पूर्ववर्ती सरकारों पर दायित्व डाल देते हैं. ऐसे करके दोनों सरकारें अपनी कार्य-कुशलता और प्रशासनिक अनुभव को प्रश्न-वाचक दायरे में खड़ा कर लेती हैं. अभी गोरखपुर अस्पताल में नौनिहाल और मासूमों की जो निर्मम बलि दी गयी उसके लिए भी सूबे की सरकार पिछले 12 साल की सत्ता को दोषी बताया गया.लेकिन ऐसा करके लोगों ने सूबे के मुख्यमंत्री अनुभवहीनता को शक के दायरे में ला कर खड़ा दिया है.क्योंकिमात्र कुछ दिन पहले मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ एक समीक्षा बैठक करके आये थे.हरघटना के बाद केंद्र और सूबे कीसरकारें मामले की गंभीरता को हल्का करके कानून व्यस्था के साथ आँख-मिचौली और लुका-छिपी का खेल रही है. जिसके परिणाम स्वरुप सूबे की जनता को भविष्य में और ही संगीन अपराधिक घटनाओं की संभावना सदैव बनी रहती है.

लेखक: शैलेश, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं और किसान के मुद्दे पर अध्ययनरत है.