लोग कहते हैं कि जो जेएनयू आज सोचता है, देश के बाकि लोग उसे बाद में सोचते हैं| हालांकि, यह कितना सच है, एक अलग परिचर्चा का विषय है लेकिन कुछ ऐसी बातें जरूर है, जो इस यूनिवर्सिटी को ख़ास बनाती है – खासतौर पर यहाँ सालाना होने वाली छात्र चुनाव और बगैर हिंसा के वैचारिक विमर्श की आज़ादी| लेकिन, आज हम केवल यहाँ के छात्र राजनीति की बात करेंगे| यह भी बताना जरूरी है कि वर्तमान सरकार ने कैंपस में मानवाधिकार और कैपिटल पनिशमेंट के मूद्दे के विचार को एक अलग ट्विस्ट देने की कोशिश की है| साथ ही भारतीय जनता पार्टी की सरकार लगातार जेनयू पर हमलावर रही है| सरकार को यह अंदेशा कि यह यूनिवर्सिटी में देशभक्ति की भावना कम है| इसी कड़ी में यहाँ के वाईस चांसलर ने देशभक्ति स्थापित करने के लिए टैंक का भी बीते दिनों मांग किया था| फिर भी यहाँ अन्याय के खिलाफ, देश के किसान और मजदूर के मुद्दे, महिला अधिकार और मैरिटल रेप पर बहस जारी है| किन्तु, बहुत बार सवाल यह भी उठता रहा कि वाम राजनीति उन सवालों को उठाता तो है किन्तु उसे अमलीजामा पहनानाने में हमेशा पीछे रहा है|

अगर हम देखे तो जेएनयू का चुनाव ख़ास इसलिए है क्योंकि यहाँ चुनाव में तमाम जातिय और अन्य मुद्दों का समीकरण होते हुए भी हिंसा और पैसे का बोलबोला नहीं चलता| यहाँ के ढाबो और हॉस्टल परिसरों में मोदी के नीतियों के समर्थक और विरोधी आपस में गरमा-गरम बहस करते मिल जायेंगे लेकिन यह वैचारिक और तथ्यपरक होता है| जाति व्यस्था और सामाजिक न्याय पर खुली बहस होती है और महिला हो या पुरुष सबको अपनी बात बराबरी से कहने का हक़ मिलता है| खासतौर पर सरकार के गलत नीतियों के खिलाफ यह कैंपस सदा से खड़ा रहा है और एक समावेशी समाज बनाने के बात यहाँ हमेशा से होती रही हैं| हालांकि, पिछले कुछ सालों में कैंपस के अन्दर गैर-वाम छात्र पार्टियाँ बनी है और लगातार अहम् मुद्दों पर वाम पार्टी के विफलताओ पर सवाल कर रही है|

जेएनयू में 8 सितम्बर को वोटिंग होने हैं और अलग-अलग छात्र संगठनो ने अपने उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतार दिए हैं| प्रचार-प्रसार भी चरम पर है| इसमें कुछ स्वतंत्र उम्मीदवार भी हैं, जिनका किसी संगठन से लेना देना नहीं है और अपने दम-ख़म पर चुनावी मैदान में हैं| इनके समर्थक परचा-पोस्टर लगाने में व्यस्त हैं और झुण्ड बनाकर काम्पैग्निंग हो रही है| लेकिन ख़ास यह है कि मोदी की राजनितिक पैठ का डर यहाँ भी दिख रहा है| यह कैंपस शुरुआत से वाम राजनीति का गढ़ रहा है लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद यहाँ का छात्र राजनीति भी काफी प्रभावित हुआ है| इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि कैंपस के सबसे मजबूत मानी जानी वाली पार्टी आल इद्निया स्टूडेंट एसोसिएशन (AISA) ने अन्य पार्टियां स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (SFI) और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट फोरम (DSF) के साथ गठबंधन कर के चुनाव लड़ रही है| हालांकि इस गटबंधन में कैंपस के राजनीति से फेमस हुए कन्हैया कुमार की पार्टी आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (AISF) बाहर है| इस पर बहुत सारे सवाल उठ रहे है कि वाम राजनीति कितनी एकजुट है, भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारती विद्यार्थी परिषद् का राजनितिक सामना करने में|
वही पिछले साल बढ़िया प्रदर्शन करने वाली संगठन- बिरसा अम्बदेकर फुले स्टूडेंट एसोसिएशन (BAPSA) ने अपने बूते पर चनाव लड़ने का फैसला किया है| कैंपस के छात्र बताते हैं कि बापसा तेजी से कैंपस में मजबूत हुआ है,खासतौर पर रोहित वेमुला की आत्म-हत्या, नजीब का गायब होना और सीट-कट के मामलो में संगठन ने पुरे सिद्दत के साथ प्रशासन से लड़ाई लड़ी है और आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर तक ले गए हैं| साथ में वर्षो से खाली पड़े प्रोफेसर के पिछड़ी जाति से सम्बंधित रिक्कित्यों, दलित और पिछड़े समुदाय के छात्रो से इंटरव्यू में लगातार भेदभाव, कैंपस में सामाजिक न्याय की बहाली, महिला अधिकार आदि इनके मुख्य मुद्दे हैं|

हालांकि वाम गटबंधन के मुद्दे और बापसा के चुनावी मुद्दे काफी मेल खाते हैं लेकिन वाम संगठनो पर आरोप है कि छात्र-संघ में रहते हुए भी सीट-कट और नजीब के मुद्दे पर आईसा और एसफआई संगठन ने खुलकर लड़ाई नहीं लड़ी और पुरे साल एक भी छात्र-मुद्दे को क्लीनच नहीं करा पाए| खासतौर पर बापसा का यह सवाल कि वर्षो से जेएनयू में वाम पार्टियों का गढ़ रहते हुए भी दलित और पिछड़े समुदाय के शिक्षको का न बहाली होना, दलित और पिछड़े समुदाय के छात्रो को इंटरव्यू में कम मार्क्स देना आदि गंभीर है और वाम संगठन इसका जवाब देने में अक्षम हैं| वही एबीवीपी ने कैंपस में राष्ट्रीयता के मुद्दे के साथ-साथ मूलभूत संसाधनों के दुरुस्त करने की बात कर रही है| कांग्रेस की छात्र विंग पार्टी नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ़ इंडिया ने भी अपने उम्मीदवार खड़े किये हैं|
खैर चुनावी नतीजे कुछ भी हो लेकिन कैंपस अभी पॉलिटिकली चार्ज है| बापसा, वाम-गठबंधन और एबीवीपी के बीच टक्कर दिख रहा है| हालांकि, 6 सितम्बर के प्रेसिदेन्सिअल डिबेट के बाद और साफ़ हो जायेगा कि इस बार किस पार्टी का परचम जेएनयू में लहराएगा|
नोट: यह परिचर्चा कैंपस में आम बातचीत पर आधारित है और इसे ओपिनियनप्रेस की टीम ने तैयार किया है| अगर आप भी कोई राय जाहिर करना चाहते है तो हमें अपनी राय editor@opinionpress.in पर ईमेल करें|







