Home Politics दुनिया की आधी आबादी के सवाल?

दुनिया की आधी आबादी के सवाल?

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पिछले दिनों जब भारत में बाबा राम रहीम और हाल में ही हार्वे वेंस्तैन पर यौन शोषण के आरोप लगे, तो इसने साबित कर दिया कि आज भी महिलाएं आजाद नहीं है| उनका शोषण विकसित और विकाशील देश दोनो जगहों पर हो रहा है| अगर हम कहें तो दुनिया के हरेक कोनों में महिलाओं का शोषण हो रहा है. हाल में ही एक अमेरिकी समाचार चैनल में महिलाओं के बीच यौन शोषण के मामले में एक सर्वे कराया है, जिसमे पचास प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने कहीं ने कहीं अपने ऊपर हुए यौन हिंसा की बात स्वीकारी है|  भारत में ऐसे मामले और भी ज्यादा संख्या में हो सकते हैं| लेकिन एक बात तो साबित हो गई है कि यौन हिंसा कोई भी कर सकता है, मसलन पढ़ा लिखा, अनपढ़, गरीब, और अकूत सम्पति वाला भी| दुनिया के समाजशास्त्री यौन हिंसा को अलग-अलग नजरिये से परिभाषित करते है| कोई इसे पितृसत्ता, तो कोई मानसिक और सामाजिक कंडीशनिंग के नजरिये से देखता है| नजरिया कुछ भी हो सकता है और इसका आकर लघु से लेकर वृहद् भी| लेकिन सबसे जरूरी बात है कि यह हर सेकंड किसी न किसी के साथ हो रहा है और पीड़िता को वर्षो तक अवसाद और डर के साए में रहना पड़ता है|

ऐसे में सवाल है कि इस से कैसे निपटा जा सकता है? क्या इसे पूरी तरह रोका जा सकता है? इसमें जो सबसे जरूरी है कि हम दुनिया हो यौन हिंसा के खिलाफ मुखर होने में मदद करें| यौन हिंसा से गुजरे लोगो को हम समर्थन दे और उनके साथ खरें हो| इसके लिए जरूरी है कि दुनिया के हरेक देश साफ़-सुथरी कानून और व्यवस्था लायें जहाँ एक महिला या पुरुष अपने ऊपर हुए यौन हिंसा को बेफिक्री और इत्मीनान से साझा कर सके| साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि शिकायत कर्ता को न्याय मिले| लेकिन ऐसा होना ही सबसे बड़ी चुनौती है| भारत जैसे बड़े और अमेरिका जैसे ताकतवर लोकतान्त्रिक देशो में आज भी क़ानून और नियम बनाने में महिलाओं की भागीदारी कम है, जिसके कारण क़ानून मजबूत और पारदर्शी नहीं है| भारत में तो राजनेता और मठाधीश अक्सर महिला के ऊपर हो रहे यौन हिंसा को सतही लेते है और कभी-कभी तो इसे मजाक भी बना देते हैं| ऐसे में यह साफ़ है कि सबसे पहले राजनीति और नीति-निर्माताओं को अपने दिमाग के कचरे को निकालने की जरूरत है| दूसरी यह कि कानूनी प्रक्रिया और शिकायत सुनने की विधि को आसान और लोगो की पहुँच तक लाया जाये| वरना यह बहुत दुखद और गंभीर  है कि राकेट साइंस और बेतहाशा कामयाबी के इस युग में हम देश और दुनिया की आधी आबादी को हासिये पर रख रहे हैं| जरुरत है के फेसबुक और ट्विटर पर मी टू जैसे चलने वाले  आन्दोलन सडको पर आयें, क्योंकि ट्विटर पर आन्दोलन को ट्वीट तो कर सकते हैं लेकिन आन्दोलन चला नहीं सकते|