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जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी को बर्बाद करने की साजिश क्यों हो रही है?

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जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी, जो पहले अपने शैक्षणिक गुणवत्ता और लोकतान्त्रिक मूल्यों के जाना जाता था, उसे वर्तमान में  बदतर छवि देने की हर संभव कोशिश हो रही है| खासकर के ९ फ़रवरी 2016 की घटना के बाद, जिसमे यहाँ के कुछ छात्रों पर देशद्रोही और पाकिस्तान समर्थित नारे लगाने का आरोप लगा था| खैर, आज भी यह मामला अदालत में है और अभी तक कोई फैसला नहीं आया है| लेकिन जिस तरह से इस खबर को भारतीय मीडिया, जेनेयू प्रशाशन और सत्तारूढ़ दल ने  हैंडल किया, जेनेयू के साख को झटका लगा| शोध और डाटा संग्रह के लिए दूर-दराज क्षेत्रो में गए रिसर्च स्कॉलरस को ऐसे सवालों से दो चार होना पड़ा और कहीं-कहीं तो गालियाँ भी सुननी पड़ी| लेकिन, यूनिवर्सिटी प्रशाशन और सरकार ने शायद ही इसको ठीक करने की कोशिश की|

खैर, अगर सिलसिला यही थम जाता तो कोई बात नहीं थी| यहाँ के वाईस चांसलर ने एक तरह से स्टूडेंट बनाम वीसी का युद्ध छेड़ रखा है| वो एक के बाद एक हथकंडे अपनाकर यहाँ के छात्र राजनीति और एकैडमिक कल्चर को ख़त्म करने की कोशिश कर रहे है| जैसे कि आरक्षण नीति का पालन न होने के खिलाफ समर्थन के लिए प्रोटेस्ट कर रहे है छात्रो को प्रताड़ित करना, अचानक एम् फिल/पीएचडी के सीटो में कटौती, और अभी-अभी यहाँ के छात्र यूनियन का सस्पेंशन| ये सब सवाल इशारा करता है कि ऐसे एक अकादमिक संस्थान, जो लोकतान्त्रिक मूल्यों और स्वछन्द विचारो के लिए जाना जाता है, उसकी साख को कैसे एक साजिश की तरह ख़त्म किया जा रहा है| इसके पीछे की मंशा क्या है? क्या ये सब किसी को फायदा पहुंचाने की कोशिश हो रही है? इसके लिए प्रशाशन के अलावा और कौन-कौन जिम्मेदार है? सवाल बहुत है और इस पर लम्बी चर्चा हो सकती है| यहाँ हम केवल एक ही मुद्दे को शामिल कर रहे हैं और यह जानने की कोशिश करेंगे की जेएनयू पर हमला, क्यों हो रहा है|

जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी एक देश का इकलौता यूनिवर्सिटी है, जहाँ देश के हरेक कोने से छात्र पढने आते हैं, जिसमे गरीब से गरीब और अमीर छात्र शामिल होते है| इसमें कोई शक नहीं है कि भारत जैसे देश में आज भी हायर एजुकेशन में कम छात्र जा रहे हैं और जाने वालों का इकनोमिक और सोशल स्टेटस एक हद तक अच्छा होता है| किन्तु, वर्तमान में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रो के लिए यह यूनिवर्सिटी एक ऐसी जगह है, जहाँ कम फीस, स्कालरशिप और योग्य शिक्षक के सहारे पढ़ सकते है| और यही कारण है यहाँ उन्मूल खेर जैसे छात्र आते है और यहाँ का सामाजिक और शैक्षणिक माहौल में तमाम घरेलू और आर्थिक परेशानियों के बावजूद यूपीएससी जैसे कठिन एग्जाम की तयारी के लिए प्रेरित और सफल भी होते हैं| इस यूनिवर्सिटी ने ऐसे कितने प्रशाशनिक और शोधार्थी छात्र देश और दुनिया को दिए हैं| फिर, इसे बर्बाद करने की साजिश क्यों?

अगर हम गौर करें, तो भारत में तेजी से जरुरी आवश्यकताओं का नीजिकरण हो रहा है और इसमें  शिक्षा भी शामिल है| आज हम देख सकते है कि कैसे प्राइवेट स्कूल और कॉलेज हर शहर में अपना पैर जमा चुके है और एक हद तक अच्छी शिक्षा, गरीब के लिए सपना होता जा रहा है| हाल के दिनों में जिंदल जैसे समूह भी उच्च शिक्षा जगत में कदम रख चुके हैं और रिलायंस जैसे बड़े समूह भी धमाकेदार एंट्री के लिए तैयार हो रहे हैं| तो, अगर जेनेयू जैसी यूनिवर्सिटी अपनी साख खोती है, तो प्रोफेसर और छात्रो का पलायन इन समूहों के तरफ होगा, जिसका सीधा फायदा प्राइवेट समूह को जाता है| ऐसे में फिर हायर स्टडी भी अमीरों तक सीमित रह जाएगा, क्योंकि इन प्राइवेट संस्थानों के फीस बहुत ही ज्यादा है|  ऐसे में यह जरूरी है कि हम इस पहलू पर अच्छे से विचार करें और सोचे की जहाँ के पढ़े हुए छात्र वर्तमान सरकार में एक निर्णायक भूमिका निभा रहे है, वो यूनिवर्सिटी अचानक सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए इतनी बुरी कैसे हो जाती है|

लेखक: सुजीत कुमार, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं|