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मुस्लिम समाज का द्वन्द और खिलाफत आंदोलन

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खिलाफत आंदोलन हमारे मुल्क की तारीख़ मे बहुत अहम है। यह आंदोलन न केवल मुस्लिम समाज के द्वन्द को उभारता है बल्कि यह भी बताता है कि तारीख़ के उस अहम मोड़ पर पर मुस्लिम समाज के नेताओं और बुद्धजीवियों मे किस तरह हक़ीक़त पसंद (Realistic) रुझान के बजाये एक तरह का रोमांटिक रुझान नज़र आ रहा था।

अधिकतर नेताओं और बुद्धजीवियों को यह भी नहीं मालूम था का जिस खलीफा के पद बहाली और सम्मान के लिये वह अंग्रेजी सरकार के सामने मोर्चा बने हुए थे, वो पहले से ही अपने साज-व-सामान के साथ अंग्रेजों के सामने घुटने टेके हुए थे।

महात्मा गाँधी के मतानुसार ये बात तो समझ में आती है कि खिलाफत आंदोलन एक अच्छा अवसर है हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने का लेकिन यह बात भी छुपी हुयी नहीं थी कि गाँधी जी इसके ज़रिये से मुस्लिम समाज के नेताओं और चिंतकों को एक नए रास्ते पर ले जा रहे थे। महात्मा गाँधी इसके ज़रिये मुस्लिम लीग के असर को बे असर बनाना चाहते थे। इसी वजह से इस आंदोलन को उत्तर भारत केन्द्रित बनाया गया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विधालय इसका केंद्र बना। इसके दो बड़े कारण थे। पहला यह कि सर स्य्येद अहमद खान के द्वारा स्थापित किए गए इस विश्व विधालय मे बड़ी जन संख्या ऐसे लोगो की थी जो अंग्रेजी सरकार के साथ खड़ी थी। यह लोग हरगिज़ ऐसे नहीं थे कि सिर्फ बातों से उनको सहमत कर लिया जाता। इनमे बड़ी तादाद ऐसे लोगो की थी जिनको बिना किसी ठोस आधार पर सहमत करना मुश्किल था।

महात्मा गाँधी के द्वारा पोषित खिलाफत आंदोलन के अधिकतर नेता आधुनिक शिक्षा से लैस थे। लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि इनके भाषणों और टारगेटेड लोगों मे इनके जैसे ही आधुनिक शिक्षित मुस्लिमों के लिये बहुत कम जगह और आकर्षण था। इसके विपरीत मुस्लिम समाज के उन लोगों को आकर्षित करने का सामान ज़्यादा था जो लोग हक़ीक़त पसंद कम और धार्मिक लोगों से ज़्यादा प्रभावित एवम संचालित होते थे।

अली ब्रदर्स (मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली) और दूसरे नेताओं कि गतविधियां यह बताती है कि आधुनिक शिक्षा से लाभान्वित इन नेताओं ने इस पूरे दौर मे अर्थात खिलाफत आंदोलन मे उन मुस्लिम लोगों को कभी भी अपनी मुहिम का हिस्सा नहीं समझा जो आधुनिक तरीके से शिक्षित थे? उनका क़ुसूर शायद यह था कि वह फैसले कि घड़ी मे भावना के बजाये तथ्य (Fact) को महत्व देते थे। और उस दौर मे ये लोग कांग्रेस से कोई खास प्रभावित नहीं थे। कॉंग्रेस अपने खास उसूलों के अनुसार चल रही थी जिसमे शायेद ऐसे लोगों के लिये कोई जगह नहीं बनती थी। यह रवय्या अपने वक़्त मे कितना भी अचूक रहा हो लेकिन मुस्लिमों के एक बड़े तबक़े की हिचक को दूर करने मे यह नाकाम था।

इस संदर्भ में महात्मा गाँधी के ज़रिये मुस्लिमों को कांग्रेस से क़रीब लाने के लिये खिलाफत आंदोलन को भरपूर समर्थन देना एक तौर पर सही हो सकता है। लेकिन मुस्लिम समाज के शिक्षित वर्ग को आंदोलन के दायरे से किनारे रख सिर्फ उन लोगों को निशाने पर रखना जो आम तौर पर अशिक्षित थे और उनका एक बड़ा हिस्सा धार्मिक लोगों से प्रभावित था। क्या ये बात उस वक़्त अजीब और हक़ीक़त से दूर नहीं थी? साफ तौर पर यह एक रोमांटिक किस्म की पहल थी। इसके पीछे जज़्बात का तूफान तो हो सकता है लेकिन इसे हक़ीक़त पसंदी( Realistic Approach) हरगिज़ नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि इसे हम रोमांटिक और द्वन्द से भरा कदम कह सकते हैं। इस बात को मज़बूत आधार इसलिए भी मिलता है कि इसके नेतृत्व कर्ता खलीफा और अंग्रेज़ी साम्राज्य के सम्बन्धों से अंजान नहीं थे। यह सब जानते हुए भी किसी ठोस बुनियाद के साथ जागरूक मुस्लिम वर्ग के सामने नहीं जा कर ऐसे लोगों कि तवज्जो हासिल करने की कोशिश करना जो अपने आस पास कि गतविधियों से भी अच्छी तरह वाकिफ़ नहीं थे। ये प्रयास किस काम का और इसकी अहमियत क्या? यह एक बचकाना क़दम था और इसका नेचुरल नतीजा यही आना था। अंतत: यह पूरा आंदोलन सिर्फ और सिर्फ हवा हवाई साबित हुआ। ऐसा आंदोलन जिसकी बुनियाद तथ्य (Fact) पर न हो हमेशा फूसफुसा साबित होता है। भूतकाल मे गुज़रे बहुत से आंदोलन इस दावे के सच होने पर अपनी मोहर लगाते हैं।

लेखक: जुबैर आलम, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में रिसर्च स्कॉलर हैं|