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उत्तर गुजरात सूखाग्रस्त क्षेत्र को दिखा रहा रास्ता

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एक तरफ भारत आर्थिक और सामरिक विकास में नए कीर्तिमान गढ़ रहा है, वही दूसरी तरफ किसान परेशान हैं और गाँवों से पलायन जारी है| भारत के कुछ हिस्से जैसे कि बुंदेलखंड आज भी सिंचाई और पेय जल की किल्लत और सुखा की समस्याओं से जूझ रहा है और आगे का रास्ता साफ़ नहीं है| वही दूसरी और उत्तर गुजरात भी एक समय बुंदेलखंड जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहा था| लेकिन विगत कुछ वर्षो में उत्तर गुजरात में विकास का पैमाना भारत के सुखा ग्रस्त इलाकों के लिए एक रास्ता दिखाता है|

भारत में पलायन की समस्या और इसके कारण

उत्तर गुजरात जिसके हिस्से बनासकांठा, साबर-कांठा, अरावली, पाटन, मेहसाना और पालन जिले हैं और उत्तर प्रेदश के बुंदेलखंड का हिस्सा जो प्रशासनिक स्तर से दो मंडलों (चित्रकूट और झाँसी) में तथा सात जनपदों (चित्रकूट, बाँदा, हमीरपुर, जालौन, झाँसी, और ललितपुर) में बंटा हुआ है| इन दोनों क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति में काफी समानता है| उत्तर गुजरात भारत की अरावली पर्वत श्रृंखला में स्थित है तो दूसरी तरफ बुंदेलखंड विन्ध्य पहाड़ी का हिस्सा है| दोनों ही क्षेत्र अलग-अलग खासियत के साथ अपनी समानता और विषमता के कई रंग समेटे हुए है| मार्च से लेकर मानसून के आने तक शहरों की तरफ तेजी से पलायन यहाँ के लिए सामान्य बात रही है| दोनों ही जगहों पर पलायन का कारण जल संकट था|

अगर भूगर्भ जल के स्तर को देखा जाय तो बुंदेलखंड की तुलना में उत्तर गुजरात के जल संकट की स्थिति ज्यादा विकराल है| लेकिन इस जल संकट का प्रभाव उत्तर गुजरात के जन-जीवन पर उतना दुखदायी एवं प्रलयकारी नहीं है जिनता बुंदेलखंड के जन-जीवन पर है| बुंदेलखंड में भूगर्भ जल का स्तर 150-200 फीट गहरा है तो उत्तर गुजरात में ये स्तर 800-1000 फीट तक पहुँच जाता है| कई गाँवों में भूगर्भ जल की गहराई 1200 फीट भी सुनने को मिली| लेकिन इसके बावजूद भी उत्तर गुजरात के  किसान अपनी बेहतर जल-संचयन के साथ साथ भूगर्भ जल का इस्तेमाल कर रहे हैं| आज जल-संकट के कारण उत्तर गुजरात का पलायन लगभग नियंत्रित है| जिसके चलते यहाँ के किसानों की स्थिति बेहतर है तथा किसान आत्म-हत्या जैसी घटनाएँ सुनने को नहीं मिलती| पर बुंदेलखंड का किसान 150-200 फिट गहरे पानी का उपयोग अपने दैनिक कार्यों में नहीं कर पा रहा है| जिसके कारण आत्म-हत्या और पलायन आज भी एक अभिशाप बना हुआ है|

उत्तर गुजरात ने निकाला रास्ता

इसमें कोई संदेह नहीं कि एपीएमसी (एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स मार्केटिंग को-ऑपरेटिव्स), अनाज-मंडी, सब्जी-मंडी जैसी संस्थागत संरचनाएं, और इनकी पारस्परिक समझ किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं| ऐसा नहीं कि गुजरात सरकार ने किसान हित में बहुत अच्छी निति बना दी हो| सरकार की उदासीनता और निष्क्रियता का अंदाजा साबर-कांठा की एक घटना से लगा सकते हैं| गाँव के कुछ किसान अपने गाँव के खाली पड़े तालाब को भरवाने के गुजरात के एक बड़े नेता के सामने लगभग तीन-साढ़े तीन साल तक  गिड़ गिड़ाते रहे | लेकिन वो तालाब नहीं भरा| फिर किसानों ने पियथ सहकारी मंडली बनाकर लगभग कई करोड़ के लागत से भूमिगत पाईप  द्वारा 22-25 किमी की दूरी तय करके धैरोई डैम से अपने खेतों तक सिंचाई हेतु पानी लाए| किसानों की इस सफलता के पीछे उनका आपसी सहयोग बताया गया|

सरकारी उदासीनता और सामाजिक सहभागिता

एक कृषि प्रधान देश में तंत्र की इस तरह की उदासीनता दुखद एवं चिंतनीय है|वर्तमान सरकार भले ही प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की सफलता की ढ़ोल पीटे या हर खेत को पानी, पर ड्रॉप मोर क्रॉप का नारा दे| लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी किसान अपने खेतों की सिंचाई के लिए मानसून पर ही निर्भर है| बीबीसी हिन्दी के एक रिपोर्ट के अनुसार आज भी गुजरात का 16 -20 % खेती का हिस्सा मानसून पर आश्रित है| राष्ट्रीय स्तर पर या बुंदेलखंड के सन्दर्भ में मानसून आधारित खेती का आंकड़ा और भी बढ़ जाता है| पर मामले के तह में जाने के बाद पता चला कि उत्तर गुजरात की बेहतर स्थिति का मुख्य कारण सहकारिता आन्दोलन है| कई दशकों से गुजरात के गाँवों में दुग्ध सहकरी समितियों का सघन जाल बिछा हुआ है| जो कृषि और पशु-पालन में संतुलन बनाई हुई है तथा कृषि के ऊपर किसानों की अत्यधिक निर्भरता को कम करने में महत्वपुर्ण भूमिका निभाती हैं|

उत्तर गुजरात मॉडल हो सकता है सूखे क्षेत्रो  के लिए वरदान

लेकिन इससे इत्तर बुंदेलखंड का किसान अपनी आमदनी के लिए सिर्फ और सिर्फ खेती पर निर्भर है| खेती और पशु-पालन में कोई संतुलन देखने को नहीं मिलता| बुंदेलखंड का किसान खेती पर अत्यधिक निर्भर है| जो कि प्रत्यक्ष रूप से मानसून पर आधारित है| वैसे भी भोगोलिक रूप से बुंदेलखंड भारत के शुष्क क्षेत्र का हिस्सा है| इसलिए सुखा इस क्षेत्र के लिए प्रकृति का उपहार भी है| जल-वायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी प्राकृतिक आपदाएं सूखे की आवृति को बढ़ा दी हैं| इसलिए इस दौर में मानसून का खेती से आँख मिचौली किसी से छिपा नहीं है| आकाल और सूखे की स्थिति से किसान को अक्सर गुजरना पड़ता है| महंगाई के कारण खेती की बढ़ती लागत की एक अलग ही व्यथा है| खेती के प्रति सरकारी उदासीनता एवं निष्क्रियता अपनी जगह पर है| इन सब कारणों की वजह से खेती आज घाटे का सौदा बना हुआ है| परिणाम स्वरुप बुंदेलखंड का संकट आज और भी गहरा हो गया है| इसलिए इस संकंट से निजात पाने के लिए सरकार, समाज, और सामाजिक संस्थाएं को अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी पड़ेगी ताकि  आमदनी के वैकल्पिक स्रोतों  को अपनाकर कृषि के ऊपर की अत्यधिक निर्भरता को कम किया जा सके जैसा कि उत्तर गुजरात में हुआ है|

नोट: यह लेख मेरा उत्तर गुजरात और बुंदेलखंड में एक महीने के फील्ड सर्वे पर आधारित है|