आजकल खबरियां चैनल और अखबार से दूर रहता हूँ। टीवी पर न्यूज़ देखना बंद कर दिया है और घर आने वाले अखबार को नो बोल दिया है। यह सब दिमाग को कंफ्यूजिया देते है।
अब आप ही सोचिये पाकिस्तानी रुपये का गिरना आर्थिक संकट और हिंदुस्तानी रुपये का गिरना आर्थिक तरक्की कैसे हो सकता है? आप भी कंफ्यूजिया गए न?
ये सब दिमाग मे चल रहा था कि भाभी भैया को डांटने लगीं की खैनी क्यों खा रहे है? कितनी बार मना किया, धूम्रपान मत कीजिये। और फिर बैठ गई गुल मंजन से दांत साफ करने। हाँ वही गुल मंजन जिससे दांत कम साफ होता है पर नशा खैनी से ज्यादा होता है।
आप सोच रहे होंगे भाभी का गुल दातमंजन बीच मे कहाँ से आ गई? देखिये रुपये का गिरना खैनी और खैनी से बने दंतमंजन गुल के उपयोग जैसा है।
विपक्षी राजनीतिक दल के लिए रुपया खैनी हो जाता है, धूम्रपान जो वर्जित होना चाहिए और जब सरकार में आते है तो रुपये का गिरना गुल दंतमंजन हो जाता है जिससे दांत साफ होता है। लेकिन खैनी और गुल दातमंजन के साइड इफ़ेक्ट जनता को ही झेलने पड़ते है।
चलिए अब इसका हसाब किताब समझाता हूँ, इसके लिए अपने सबसे खास परोसी देश पाकिस्तान की बात करते है।
आज पाकिस्तान की जमात, अपने नए हुक्मरान इमरान खान से बहुत खफा होंगें। खफा होने की बजह भी साफ है। इमरान खान ने यह क्या कर दिया सरकार में आतें ही?
इन्होंने ईमानदार सरकार के लिए बादा किया था। भ्रष्टाचार मुक्त पाकिस्तान का बादा भी किया था। पर इन्होंने पाकिस्तानी रूपया को इतना गिरा दिया कि सभी हैरान है और यह कह रहे होंगे, “इमरान ये तूने क्या किया?”
लेकिन भारत मे इसका उल्टा है। रुपया तो यहाँ भी गिर रहा है लेकिन यहाँ विकास के लिए गिरने वाला रुपया राष्टवादी है। क्योंकि यहाँ के हुक्मरान राष्ट्रपुत्र श्री नरेंद्र मोदी है।
इनके राज में लोगो पर लगने वाला लगान हो या समझ मे नही आने वाला जीएसटी हो या देश के गरीबों की चमड़ी भी निचोड़ लेने वाला नोटेबन्दी हो, या लगातार गिरने वाला रुपया हो, सभी राष्टवादी है।
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर पटेल जी ने साफ-साफ कहा है कि घरेलू मुद्रा अपने उभरते बाजार के साथियों की तुलना में अभी भी बेहतर है। जी हां, मतलब सही पकड़े हैं, “गिरना हमेशा खराब नही होता है।” बस सरकार श्री नरेंद्र मोदी जैसी होनी चाहिए।
आप इमरान साहेब को नरेंद्र मोदी का दूसरा रूप कबूल कर ले। यकीन माने, एक बार कबूल बोलने के बाद ही पाकिस्तानी रुपये का गिरना राष्टवादी लगने लगेगा।
एक बात ध्यान रखना होगा भारत का देशद्रोही विपक्ष मेरी इस बात को मानने से मना करेगा। वे लोग कहेंगे कि स्वयं राष्ट्रपुत्र नरेंद्र मोदी जी ने चुनाव में मनमोहन सरकार की आलोचना कर चुके है जब मनोहन जी का रुपय गिर रहा था। और कहा था कि मनमोहन सिंह से रुपया नही संभल रहा है? देश कैसे संभलेगा?
तब, उनको याद दिलाना होगा कि केन्द्री मंत्री नितिन गडकरी ने मराठी चैनल को दिए इंटरव्यू में यह साफ-साफ यह माना है हर बादा करने के लिए नही बोला जाता, बहुत सारा जुमला भी होता है।
रुपया गिरना खराब होता है यह भी राष्ट्रपुत्र नरेद्र मोदी जी का जुमला समझ लीजिये। बाकी तो आरबीआई के गवर्नर ने क्लियर कर ही दिया है।
वैसे रुपया पहली बार नही गिरा है। जबसे देश आजाद हुआ है, यह गिरता ही जा रहा है। 1947 में 1 डॉलर के बराबर रुपया को 1966 में सरकार के द्वारा अवमूल्यन करके ₹7.50 कर दिया गया था। यह जो एक बार शुरू हुआ फिर रुकने का नाम नही लिया। जुलाई 1991 के भारत मे जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे और नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे, रुपये के एक दिन में 18 से 19 प्रतिशत अवमूल्यन(गिरा दिया) किया गया था। यह विकास वाला अवमूल्यन था।
रुपया का गिरना भी सरकार की गुप्त आर्थिक नीति होती है। इसलिए रुपया हमेशा गिरता ही रहा है। रुपये के इसी प्रकृति को देख कर यही गीत याद आता है, “घुंघरू की तरह बजता ही रह हूँ, कभी इस सरकार में कभी उस सरकार में”
यह रुपये का गिरना नही था बल्कि यह भारत की आर्थिक शक्ति बनने की आधारशिला थी। रुपये के गिरने और गिराने का वो दिन था और आज का दिन। जहाँ मनमोहन सिंह को देश की आर्थिक विकास का पितामाह माना जाता है।
उस समय भी हिदुस्तान के बारे में यही कहा जाता था कि देश भारी आर्थिक संकट में है जैसे आज के दिन पाकिस्तान के बारे में बोला जा रहा है कि पाकिस्तान पर डिफाल्टर होने का खतरा मंडरा रहा है।
यकीन मानिये, मेरे पाकिस्तानी मित्र, पाकिस्तान बड़े आर्थिक बदलाव से गुजर रहा है, कुछ कड़े फैसले लिए जाएंगे बोला जायेगा हमारे पास कोई चारा नही है। लेकिन सब झुठ होगा।
दरसल इमरान खान मनमोहन सरकार की तरह देश का काया पलट करने वाले है। बस आपके रुपये को गिरना होगा। और यह सिलसिला लगातार कायम रखना होगा तब भी जब पाकिस्तान, हिदुस्तान की तरह विश्व आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित हो जायेगा, जैसे आज हिदुस्तान का रुपया गिर रहा है।
अब क्या सोच रहे है? खुशी मनायें। मिठाई बाटें और पटाखों से देश को भर दे। यह दोहरी खुशी का मौका है। दोनो भाई देशों का रुपया गिर रहा है।
एक आर्थिक विकास के माउंट एवरेस्ट पर बैठने वाला है दूसरा उसी माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई को तैयार हो रहा है।
यकीन मानिये गिरना खराब नही होता। अपने हुक्मरानों से कुछ सीखे एक बार खुद को गिरा कर देखे। कबतक सरकार के हाथों गिरते रहेंगे?
हिंदी में एक कहावत है, “गुड़ खाये और गुल-गुल्ले से परहेज”? विकास चाहिए और महंगाई से परहेज? ऐसा नही होता। आप पूंजीवादी लोक के गिरफ्त में है। रुपये का गिरना जीवन का हिस्सा बना लीजिए, कष्ट नही होगा।










