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कैसे लड़ेगी कनफ्युज्ड पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) फासीवाद से?

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आज जब न केवल देश में बल्कि सारी दुनिया में दक्षिणपंथी और फासीवादी ताकतों का उभार हो रहा है, ऐसे में आजाद भारत की दूसरी विपक्षी पार्टी रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की पूरी संरचना और सिद्धांत पर सवालिया निशान लगाकर पार्टी कांग्रेस में कनफ्युज्ड पार्टी ऑफ इंडिया होने की घोषणा हो जाती है। यह एक आसाधारण बयान था जिसे सुन कर किसी को भी हैरत हो सकती है। यह घोषणा उस पार्टी के बारे में की गयी, जिस पार्टी से पी.सी. जोशी, अजय घोष, एम. फारूकी, इंद्रजीत गुप्ता, भूपेश गुप्ता, झारखंडे राय एवं ए. बी. बर्धन जैसे न जाने कितने नामचीन नेता जुड़े रहे।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अप्रैल 2018 में भाकपा की 23वीं पार्टी कांग्रेस में जब एक खास जाति का मीडिया निर्मित अवतारी नेता कन्हैया कुमार, 92 साल के संघर्ष, विरासत एवं विचारधारा वाली पार्टी को कनफ्युज्ड पार्टी ऑफ इंडिया बताता है, तो क्या कारण है कि पूरा नेतृत्व और पार्टी के राष्ट्रीय सचिवमंडल एवं राष्ट्रीय परिषद उसका एक बाल भी बांका नहीं कर पाते हैं। सारे महारथी नेता मौन बने रहते हैं, आखिर क्यों? क्या वो पार्टी के बारे में की गयी इस घोषणा से सहमत थे?

आखिर इस मौन सहमति के पीछे कौन- सी विचारधारा और सोच काम कर रही थी? कोई कामरेड इसकी व्याख्या करके मुझे बताए कि क्या पार्टी सच में कनफ्युज्ड पार्टी ऑफ इंडिया है? या फिर सवर्णवादी सोच में जकड़े राष्ट्रीय नेतृत्व के पास इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो इसकी मुखालफत कर सके और पार्टी की छवि को अवतारी कामरेड से बचा सके। आखिर यह बचाना पार्टी के सिद्धांतों और विरासत को भी तो बचाना था। इतना ही नहीं, बल्कि पार्टी के कनफ्युज्ड पार्टी होने की घोषणा करने के बाद उसे पार्टी कांग्रेस में राष्ट्रीय परिषद का सदस्य बना कर राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच अलंकृत भी किया जाता है।

मैं पूछता हूँ कि इतनी हिम्मत आई कहाँ से इस अवतारी कामरेड में? अर्थात उसे पहले से ही पूरा विश्वास था कि मैं पूरी पार्टी की छवि को दो मिनट में कुचल दूंगा और सवर्णवादी मानसिकता वाला कामरेड कुनबा तालियां बजा कर मेरा मनोबल बढ़ाएगा। ऐसा घटित भी हुआ। एक दो आवाजें विरोध में उठेंगी जिसे पार्टी की सवर्णवादी संरचना अपना रौब दिखा कर खामोश कर देगी। आखिर यह बोलने का साहस कहाँ से आया? उसके अंदर किन राष्ट्रीय नेताओं के प्रश्रय में यह अदम्य साहस उफना रहा है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर पार्टी को कनफ्युज्ड पार्टी ऑफ इंडिया घोषित करने पर अवतारी कामरेड कन्हैया कुमार के खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं लिया गया? आखिर इस मौन सहमति का राज़ क्या है? क्या यह मान लिया गया कि एक व्यक्ति पूरी पार्टी और सिद्धांतों से सर्वोपरि है?

आपको बता दूँ कि कम्युनिस्ट पार्टियों की पार्टी कांग्रेस बहुत महत्वपूर्ण होती है। इस कांग्रेस में पार्टी की नीतियों, सिद्धांतों तथा आगामी कार्यक्रमों के ड्राफ्ट को अंतिम रूप दिया जाता है और भविष्य की राह को निर्धारित किया जाता है। पूर्व के कार्यक्रमों की समीक्षा होती है और नीतियों में बदलाव भी किये जाते हैं। सवाल यह है कि जब पूरी पार्टी ही कनफ्यूज्ड है तो फिर उसकी नीतियाँ और सिद्धांत भी उसका शिकार होंगे। तो फिर पार्टी फासीवाद और पूंजीवाद से कैसे लड़ाई लडेगी? इसका मतलब तो यही हुआ कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के लड़ाई लड़ने के दावे सब खोखले हैं। कोई पार्टी कनफ्युज्ड होकर कैसे कोई लड़ाई लड़ सकती है?

सैद्धांतिक रूप से 23वीं पार्टी कांग्रेस में क्या अवतारी नेता ने कनफ्युज्ड पार्टी के ड्राफ्ट एवं नीतियों को स्पष्ट एवं सुधार करने की कोशिश की? क्या उसमें कुछ जोड़ा-घटाया? इस कांग्रेस में पार्टी के कनफ्यूज्ड सैद्धांतिक ड्राफ्ट में अवतारी कामरेड ने कौन-सी तब्दीली की है? पार्टी जनता के समक्ष उसे उजागर करे जिससे जनता जान सके कि अवतारी कामरेड ने पार्टी के कनफ्युजन को दूर करके एक नई दिशा दी है या फिर 23वीं पार्टी कांग्रेस के बाद अभी भी पार्टी कनफ्युज्ड पार्टी ऑफ इंडिया बनी हुई है?

एक बात मैं आप सबको और बता दूं कि सीपीआई के पास पूरे देश में एक से बढ़ कर एक धुरंधर बुद्धिजीवियों का समूह और चिंतक वर्ग भी है। यह बुद्धिजीवी वर्ग पार्टी के वैचारिक कनफ्युजन और समाज में हर रोज घट रही घटनाओं और बदली परिस्थितियों के अंतर्विरोध को समझने के लिए रात-दिन मानसिक मशक्कत करते रहते हैं। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के नियमों के हिसाब से समाज के परिवर्तनों की मीमांसा करते हैं। अब यह मीमांसा कितनी सही और कितनी ग़लत होती है, यह अलग विषय है। पूरे देश के विश्वविद्यालायों और अन्य संस्थानों में फैले पार्टी के इन बुद्धिजीवियों के कुनबे ने क्या मान लिया कि पार्टी और उसकी पूरी सैद्धांतिक संरचना ही कंफ्युज्ड है? क्या इन बुद्धिजीवियों के कुनबे ने पार्टी को कनफ्युज्ड घोषित किए जाने के खिलाफ कोई सामूहिक बयान या ड्राफ्ट जारी किया? अगर नहीं किया तो फिर सवाल उठता है कि पार्टी के इस तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग का जातीय और वर्गीय चरित्र क्या है? आखिर पार्टी के बारे में इतनी खतरनाक घोषणा करने के बाद भी इन बुद्धिजीवियों में उस अवतारी कामरेड को लेकर कौन सा सम्मोहन काम कर रहा है? क्या यह वर्ग अपने इस सम्मोहन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू को स्पष्ट करने की कोशिश करेगा?

अब यही बात भूल से डी राजा के मुंह से निकल जाती, जिसे अवतारी कामरेड का पूरा कुनबा, पार्टी के अंदर डोम राजा की उपाधि से विभूषित करता है, या फिर किसी दूसरे दलित, पिछड़े नेताओं के मुंह से यह बात निकली होती तो क्या यह तथाकथित बुद्धिजीवी, पूरा राष्ट्रीय नेतृत्व या राष्ट्रीय परिषद के धुरंधर कामरेड खामोश रहते? मेरे आकलन में उसकी ऐसी दुर्दशा करते कि आने वाले कई सालों तक फिर कोई पिछड़े तबके से आने वाला कामरेड पार्टी के बारे में ऐसी बयानबाजी करने का साहस न जुटा पाता। हालांकि यह अनुमान बहुत हल्का है। इससे भी भयानक दुर्दशा कुछ करते जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

ऐसी आम धारणा है कि कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर इस तरह की कई घटनाओं पर पूरा राष्ट्रीय नेतृत्व तथा उसके डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म की संरचना का चरित्र और व्यवहार सवर्णवादी मानसिकता से पोषित रहा है। यह एक सच्चाई भी है क्योंकि यह घटना भी उसी की एक बानगी है। कम्युनिस्ट पार्टियों के बारे में बहुजन बुद्धिजीवीयों तथा दलित-पिछड़े कामरेडों का जो आरोप है, वह यहीं सही साबित हो जाता है। जैसा कि 2015 में सीपीएम के 22वें पार्टी कांग्रेस में एक पत्रकार ने सवाल पूछा कि क्यों आपकी पार्टी के पोलिट ब्यूरो में हमेशा बाभन, कायस्थ, राजपूत, आदि उच्च जाति के ही लोग होते हैं? पार्टी के 53 साल में क्या आपके पोलित ब्यूरो में कोई दलित है? प्रकाश करात का जवाब आता है कि हम रिकार्ड चेक करेंगें कि पार्टी के पोलित ब्यूरो में कोई दलित है कि नहीं? लेकिन उन्हें कोई भी नाम याद नहीं है। एक दो टोकन नामों को छोड़कर यही आलम सीपीआई का भी है। अगर पार्टी की शुरूआत से उसके नेतृत्व की सामाजिक पृष्ठभूमि और संरचना का विश्लेषण किया जाए तो ऐसे तथ्य प्राप्त होंगे जिससे यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि कम्युनिस्ट पार्टी की पूरी नेतृत्वकारी संरचना सवर्णवादी मानसिकता और वर्चस्व से परिपूर्ण है। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श जबसे सामाजिक, अकादमिक और राजनीतिक, आदि क्षेत्रों में आया है, उसने ऐसे मूलभूत सवालों को आधुनिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया कि इनकी पूरी सवर्णवादी संरचना चरमरा गई है। मगर अभी भी जातीय दंभ इस कदर हावी है कि अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए रात-दिन षडयंत्र करते रहते हैं। हालांकि आजकल अपना सवर्णवादी चरित्र बचाने के लिए या यूं कहें कि खानापूर्ति के लिए अब ये एक-दो दलित चेहरों का नाम जपने लगे हैं।

अंतिम बात यह है कि सवर्णवादी मानसिकता बहुत घातक और शातिर होती है। जब उसके अस्तित्व को चुनौती मिलती है तो वह सवाल उठाने वाले को ही जातिवादी और जातीय द्वेष से प्रेरित होने की दुहाई देने लगता है। अगर सवर्णवादी कुनबे का वर्चस्व खतरे में आया, तो उल्टा आपको ही कटघरे में खड़ा कर देता है। यहीं उसकी शातिराना चाल और धूर्तता को समझने की ज़रुरत है। मैनें जो सवाल उठाए हैं वो बहुत ही सैद्धांतिक और एक पार्टी विशेष के पूरे राजनैतिक वुजूद से जुड़ा हुआ सवाल है। लेकिन इस बात को मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि जो हमारा अनुमान है, वही उपर्युक्त सवालों की परिणति होगी। बिहार की एक सवर्ण जाति विशेष का राष्ट्रीय कुनबा जो ट्रोलर गिरोह बन कर पूरे लेख को जातीय-द्वेष से लिखा गया घोषित करेगा। लेकिन अवतारी नेता के प्रति जो जातीय सम्मोहन है, वह किस मानसिकता की उपज है, इसका कोई जवाब नहीं मिलेगा। दलित-पिछडे कामरेडों द्वारा ऐसा एक बार नहीं। बल्कि कई बार कम्युनिस्ट पार्टियों के दफ्तरों में यह सवाल उठाया जा चुका है, लेकिन सवर्णवादी वर्चस्व के तहत उन सारे प्रश्नों पर लीपापोती करके उन सवाल उठाने वालों को ही पार्टी संरचना से बाहर फेंक दिया जाता है। 2014 के लोक सभा चुनाव के दौरान बिहार के कई जिलों में इस घटना को अंजाम दिया गया। जबकि वास्तव में दो भूमिहारों की चुनाव लड़ने को लेकर आपसी लड़ाई थी जिसमें दलित-पिछड़े कामरेड पिस गए और अंततः उन्हें पार्टी से बाहर होना पड़ा। दिल्ली राज्य के पार्टी कांफ्रेस में नेतृत्व के चयन के समय भी यही धूर्तता और षडयंत्र को दोहराया गया जबकि कई आवाजें इसके विरोध में भी उठी थी।

सवाल यहां जाति विशेष का नहीं है, बल्कि पार्टी के मूल्यों और सिद्धांतों पर है जिसे 23वीं पार्टी कांग्रेस में सवालों के घेरे में लाया गया। कुछ सवर्णवादी जेहन यह दलील देंगे कि आज छः महीने बाद इस घटना को क्यों उठाया जा रहा है? तब तो यह और भी खतरनाक बात होगी कि आखिर छः महीने हो चुके, पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व अभी तक पार्टी के कनफ्युजन को दूर नहीं कर पाया है। अगर पार्टी यह भी घोषणा कर दे कि कम्युनिस्ट पार्टी कनफ्युज्ड पार्टी नहीं है, बल्कि पार्टी की सवर्णवादी संरचना अवतारी नेता के सम्मोहन में इतनी बौरा गयी है कि पार्टी की हैसियत उसके सामने कुछ भी नहीं है। वह पार्टी के मूल्यों और सिद्धांतों से भी ऊपर है। यह भी एक राजनीतिक पोजिशन हो सकती है। लेकिन इस खामोशी की वजहों और नीयत पर सवाल तो खड़ा होगा, अब चाहे कल खड़ा होता या 6 महीने बाद। मेरे प्रश्नों का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जनता में जवाब दे और अवतारी कामरेड के प्रति अपने सम्मोहनकारी रवैये को स्पष्ट करे। सवाल अभी भी वही है कि क्या कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया अभी भी कनफ्युज्ड पार्टी ऑफ इंडिया है? या फिर उसका कनफ्युजन दूर हो गया है और कनफ्युज्ड बोलने वाले पर क्या कार्यवाही की गयी?

नोट: मुलायम सिंह, सीपीआई के छात्र विंग ऑल इंडिया स्टूडेंटस फेडरेशन में पांच साल तक काम कर चुके हैं|