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सोशल मीडिया और स्त्री विमर्श

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Image Credit: hindustantimes.com

जब भी बात महिला को लेकर समाज की मानसिकता की होती है, तो पुरुष अपनी  पुरुषवादी सोच की नुमाईश शुरू कर देते हैं।  वे हमेशा महिला के सम्बन्ध में कोई भी बात-चीत होते ही लड़कियों के पहनावे पर तंज कसना शुरू कर देते  हैं। बड़े-बड़े सेमीनार में भी ये मुद्दा उठाया जाता है। देश में सामान्य पुरूष से लेकर बड़ी- बड़ी पंचायतो के सदस्य तक, महिला से जुड़ी हर परेशानी का एक ही कारण मानते हैं वह है ” महिला परिवेश”। जिसकी वजह से आज भी हमारा स्त्री-विमर्श यहीं सिमट कर रह जाता है।

ये बात अक्सर सुनने को मिलता है कि महिला स्वतंत्रता की आड़ में स्वछन्द होती जा रही है। और बीड़ी, तंबाकू, सिगरेट पीती है। परंतु महिला कभी पुरुष के ऐसा करने पर कोई आपत्तिजनक लेख लिख कर उसकी विवेचना नहीं करती।  महिलायें पुरुषों को कभी उनकी  मर्यादा बताने का प्रयास नहीं करती हैं। ऐसा लगता है कि पुरुष होने के कारण पुरुषों को ये हक़ है कि वे महिलाओं के पहनावे पर आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग या आपत्तिजनक लेख लिख सकते हैं। ये भी पुरुष का ही अधिकार है कि महिलाओं को बताए की वे उच्च हैं, देवी स्वरूपा हैं। इसलिए उनको त्याग की मूर्ति बन जाना चाहिए और उनको स्वहित में नहीं सोचना चाहिए। महिला  परिवार की इज्जत है इसलिए उसको किसी से प्रेम भी नहीं करना चाहिए। और साथ ही पुरुष ये बताना नही भूलते कि महिला तो माँ है। जो वह पुरुषों से महान स्थान रखती है। अतः उनको पुरुष की बराबरी उनसे नीचे गिरके नहीं करनी चाहिए।

शायद ही कोई महिला पुरुषों के पहनावे या उनके घर में अथवा फ़ेस-बुक वाल पर उनके नग्न या अर्धनग्न खुद की फोटो डालने पर आपत्ति करते लेख लिखती होगी। इसके इत्तर पुरुष परिचित या अपरिचित महिलाओं की वाल पर धड़ल्ले से कुछ भी लिख सकते  हैं। और एक महिला को बहिन सम्बोधित कर उसके सोशल मिडिया पेज पर जाकर महिला विरोधी जहर उगल सकते हैं।  लेकिन महिला को ये अधिकार नहीं कि वो अपने खुद की सोशल मिडिया  पेज पर अपनी आपबीती भी लिख सके। उसके लिए भी उसको पुरुष समाज की तरफ देखने होता है कि  पापा मैं ये लिख सकती हूँ क्या, भाई मैं ये लिख सकती हूँ क्या? कहीं मेरे कुछ लिखने से या अपनी कोई फोटो सोशल मिडिया में डालने से आप के अंदर के पुरुष अहंकार को चोट तो नहीं  लग जाएगी? कही समाज के लोगों को ऐसा तो नहीं लगने लगेगा कि मैं लड़का बनने की कोशिश कर रही हूँ या हाथ से निकल गयी हूँ? अगर ऐसा हुआ तो समाज का कोई पुरूष मुझसे विवाह नहीं करेगा और कहीं मेरा विवाह समाज के निर्धारित तय-उम्र में नहीं हुआ तो आप की बदनामी हो जायेगी? क्योंकि अक्सर पुरुष को ऐसा लगता है कि स्त्री बिना दिमाग की जन्म लेती है। इसलिए अपनी इच्छा, पहनावा, कार्य, और दैनिक आवागमन के लिए हर पल उसे पुरुष-रूपी बैशाखी की जरूरत पड़ती है। जो कि सच्चाई से परे है।

आज सशक्तिकरण का दौर चल रहा है। महिला सशक्तीकरण के सेमिनारों में अक्सर हिन्दू धर्म में महिलाओं का उच्च स्थान  बताया जाता है। और बताने वाले ये भी बताना नहीं भूलते कि अब की नारी भटक गयी हैं। ये पश्चिमी सभ्यता की तरफ आकर्षित होकर भ्रष्ट हो गयी हैं। परन्तु जब हम धार्मिक साहित्य से रूबरू होते हैं तो हिन्दू देवी-देवताओं की गाथा मालूम पड़ती है। हिन्दू धर्म के दो बड़े धार्मिक साहित्य, रामायण और महाभारत, महिलाओं पर अंतहीन अत्याचार की कहानी हैं। दो राजपरिवारों की कन्या /महिलाओं (सीता और द्रौपती) की क्या दशा हुई है? फिर अन्य महिलाओं की उस युग में क्या स्थति रही होगी। ये बात कल्पना से परे है। तुलसी दस द्वारा रचित राम-चरित्र मानस में पुरुष-वादी सोच की झलक देखने को मिल जाती है। इस तरह हम पाते हैं कि भले ही महिलाओं को उच्च स्थान दिया गया हो। लेकिन मौका मिला है तो  क्या इंसान या क्या भगवान, किसी ने  महिलाओं के साथ इंसान जैसा वरताव नहीं किया है। आज भी सड़क से लेकर संसद तक हर जगह रंग और नस्ल भेद जैसी पुरुष-वादी टिप्पणी का सामना महिलाओं को करना पड़ता है।

आज हमारे पास लिखित संविधान है। जो स्त्री-पुरुष में भेद किये बिना, भारत के प्रत्येक नागरिक को स्वतन्त्रता और समानता का अधिकार देता है। इसके बावजूद भी ये पुरुषवादी समाज अपनी बातों को महिलाओं के ऊपर थोपने से बाज नहीं आ रहा है। जिसके कारण एक महिला क्या करे या क्या न करे, इन सारी चीजों के लिए पुरुष के दिशा निर्देश का इंतजार करती रहती है। इस प्रकार वह अपने व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार से वंचित हो जाती है। हमारे आस पास कई ऐसे उदाहरण हैं कि जो इस पुरुष-वादी सोच को गलत साबित तो किये हैं। साथ ही जब एक स्त्री को मौका मिला है तो पुरुष से श्रेठ और अच्छा करके दिखाई है। इसलिए देश की आधी आबादी को क्या करे क्या न करे, क्या पहने क्या न पहने, कहाँ जाए कहाँ न जाए और कैसा उसका चरित्र हो कैसा न हो जैसे झूठे और मन-गढ़ंत सच्चाई से बाहर निकलकर,  संविधान में निहित स्त्री की स्वतन्त्रता और समानता के अधिकार को, वृहद फ़लक प्रदान करने की जरूरत है। जिसके माध्यम से आज की 21 वीं सदी के स्त्री विमर्श को ज्यादा विस्तृत और व्यापक बनाया जा सके।