हरियाणा का विधान सभा क्षेत्र 60, महम, जो रोहतक जिले का हिस्सा है। ये क्षेत्र हरियाणा के जींद, हिसार और भिवानी जिले से घिरा हुआ है। जातिगत संख्या बल को देखते हुए – यह एक जाट बहुल इलाका है। इसलिए यहाँ के जो जन प्रतिनिधि हुए लगभग सभी इसी समुदाय से आते है। यहाँ के जाट समुदाय के लोग बड़े गर्व से अपने आप को चौबीसी चाबुतरा से जोड़कर अपने आप को लोकतान्त्रिक होने का दावा करते हैं। ये एक ऐसा चबूतरा है जिससे हरियाणा के सारी खाप पंचायतें जुड़ी हैं। कोई भी बड़ा फैसला करने से पहले इस चबूतरा के माध्यम से लोग अपना मत व्यक्त करते हैं। विपरीत मत रखने वाले लोगों को भी ध्यान में रखा जाता है। और सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं से रुबरू कराया जाता है। इस तरह से हरियाणा की राजनीति में इस चबूतरे का एक अलग स्थान है।

1984 के चुनाव में हार के बाद हरियाणा की राजनीति के ताऊ, चौधरी देवी लाल के राजनैतिक जीवन में मायूसी छा गयी थी। लेकिन सतलज-यमुना लिंक आंदोलन ने उन्हें हरियाणा की राजनीति में नयी जमीन प्रदान करने का काम किया। और ताऊ ने अपनी नयी राजनैतिक पारी की शुरुआत किया। इस दौरान कई सजातीय युवा नेता देवीलाल से जुड़े। उनमें से आनंद सिंह डांगी एक है, जो देवी लाल के काफी खास व करीब रहे। देवी लाल और डांगी के नजदीकियों का अंदाजा इस इलाके की प्रसिद्ध लोक-युक्ति (“ताऊ तो परजा भरने के लिए आयेगा, बाकी तो डांगी देख लेगा”) से लगाया जा सकता है। 1989 में देवी लाल सीकर और रोहतक से लोक सभा का चुनाव जीते थे। लेकिन सीकर छोड़ रोहतक से सांसद बने रहे और राष्ट्रीय राजनीति में उप-प्रधान मंत्री का पद भी संभाले तो महम की सीट खाली हो गयी। और अपने बेटे ओम प्रकाश चौटाला को हरियाणा का मुखी-मंत्री बनाए। ध्यान देने की बात है काँग्रेस के परिवारवाद का पुरजोर विरोध करके ताऊ सत्ता में आये थे। लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री पद पर ओम प्रकाश चोटला को बैठाये। इस तरह ताऊ ने राजनीति में अपने परिवार स्थापना का जो अदम्य साहस और प्रयास दिखाया, वह भारत की समाजवादी राजनीति में अपने परिवार को स्थापित करने का कोई और नायाब उदाहरण नब्बे के दशक तक देखने को नहीं मिला था। जिसका एक स्वरूप आज हमें उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में देखने को मिल रहा है।
महम को जन प्रतिनिधि को देने में का चौबीसी चबूतरा फिर एक बार महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। चबूतरे के माध्यम से लोग ताऊ की प्रतिछाया उनके ही सहयोगी और करीबी मदीना के सरपंच आनन्द सिंह डांगी में दिखी। और 40 गाँव की पंचायत – महम से आनंद सिंह डांगी को अपने प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार कर, ताऊ की मोहर लगवाने के लिए दिल्ली आयी। लेकिन ताऊ 40 गाँव की पंचायत का आदेश मानने से मना कर दिये। आखिरकार उपचुनाव की तिथि (फरवरी, 1990) निर्धारित हुई। तब तक ताऊ महम का बहम निकालने की पूरी तैयारी कर चुके थे। भयानक खून खराबे और नरसंहार के बाद ये चुनाव तीन बार में सम्पन्न हुआ। जिसका परिणाम डांगी के पक्ष में रहा। जिससे ये साबित हुआ कि लोकतन्त्र में लोक सर्वोपरि है। तंत्र तो लोक के पीछे चलने वाला एक भाग है। इस चुनाव में प्रत्याशी, समर्थक और पुलिस की हत्या हुई। भारत जैसे देश में चुनाव के दौरान ऐसी भयानक हिंसा कभी नहीं हुई थी। इस तरह इस हिंसा की वजह से महम विधान क्षेत्र 1990 के उपचुनाव के समय चर्चा में आया। एक लोक-तांत्रिक देश का उप-प्रधानमंत्री ने अपने परिवार को स्थापित करने के लिए संघर्ष का रास्ता अपना लिया। जो कोई सोच भी नहीं सकता था। इस हिंसा और नर-संहार कि वजह से देवीलाल को एक लोकतांत्रिक देश के उप-प्रधानमंत्री होते हुये एक तनाशाह या लोकतन्त्र का गला घोटने वाले व्यक्ति के रूप में चिन्हित किया गया। जिसके लिए उन्हें अपनी उप-प्रधानमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। साथ ही इसके लिए उन्हें अपने सहयोगियों की आलोचना का शिकार होना पड़ा। जिसके परिणाम स्वरूप देश व प्रदेश की किसान राजनीति में उनका कद और दायरा छोटा हो गया। इसका असर बोट क्लब के किसान आंदोलन में दिखा। आज भी चाँदी, बाइसी, और मदीना गाँव के लोग बड़ी दिलचस्पी के साथ इस घटना को एक समर-गाथा की तरह सुनाते हैं। इस गाथा के माध्यम से डांगी के प्रति लोगों की सहानुभूति भी झलकती है। जिसके परिणाम स्वरूप डांगी को कई बार महम की जनता की सेवा का मौका मिला।

लेकिन 2019 के चुनाव में लगभग बीस लोग डांगी के प्रति-द्वंदी हैं। इसलिए डांगी का रास्ता काँटों भरा होगा। क्योंकि आज 35 बनाम एक का नारा चरमोत्कर्ष पर है। जिसके परिणाम स्वरूप हरियाणा की सभी जातियाँ आज जाट समुदाय के खिलाफ खड़ी है। ऐसे तो 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कुछ विवादित नेताओं द्वारा राजनीतिक मंचों से इस नारे का इस्तेमाल शुरु हुआ था। और आज ये हरियाणा में जाति आधारित ध्रुवीकरण करने वाला सबसे मज़बूत हथियार बन गया है। इस नारे को कौन शुरू किया यह एक विवाद है। लेकिन इसमें कोई विवाद नहीं है कि इस नारे से सबसे ज्यादा फायदा भाजपा उठा रही है। फिर भी डांगी को अपने काम पर भरोषा है और वर्तमान में महम के विधायक भी है। इसलिए वह अपनी जीत का दावा करते है। परंतु आज हरियाणा में जाट आधारित राजनीति करने वाली तीन पार्टियां हैं और ऐसे हालात में जाट मतदाताओं का विभाजन लाजिमी है। इसलिए इस विभाजनकारी राजनीति के दौर में डांगी की राहें इतनी आसान नहीं दिखती हैं।









