बड़े शहरों के मुकाबले छोटे शहरों में सामाजिक न्याय की आवाज़ शायद ही बड़े पटल पर आ पाती है. जिसका मुख्य कारण मीडिया की बेरुखी और सिविल सोसाइटी की असक्रियता है. बिहार की राजधानी पटना इसका एक जीता जागता उदहारण है . वर्तामान और पिछले तीन दशक से बिहार में सामाजिक न्याय की सरकार है. लालू और नीतीश हमेशा से गरीब और पिछड़ेपन को अपने मुख्य एजेंडा में शामिल करते आयें हैं. ऐसे में सवाल ये हैं कि पटना जैसे शहर, जहाँ से राजनितिक रास्ता तय होता है, कितना कुछ गरीबो के लिए हुआ है. यह खबर उसी की परताल करती है.
पटना शहर में तकरीबन 100 से अधिक झुग्गियां है. हालांकि, इस पर यकीं करना थोडा मुश्किल है, क्योंकि मैंने खुद फील्ड स्टडी के दौरान ऐसे झुग्गी देखे, जो कुछ स्वयंसेवी संस्थाओ और सरकार द्वारा किये गए स्लम सर्वे में मौजूद नहीं है. खैर, मैंने पिछले साल, पटना में ४३ झुग्गियों का दौरा किया, जिसमे यह देखा कि यहाँ के स्लम में सबसे ज्यादा (लगभग 92 प्रतिशत) दलित समुदाय के लोग रहते हैं, जिनका मुख्य कार्य मजदूरी, रिक्शा चलाना, और घरो में दाई का काम है. सबसे चौकाने वाली बात यह है कि इसमें में मुसहर और डोम जैसे जातियों की स्तिथि बाकि दलित समुदाय के लोगो से बदतर और चिंताजनक है. हालांकि, यह बात जरुर सामने आई कि लालू राज के प्रारभिक दौर में इनकी स्थिति सुधारने के लिए कुछ जगह घर जरुर बनाये गए, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि ऐसे जगहों को बगैर किसी प्रमाणिकता के साथ विकसित किया गया, जहाँ लोगो को कोई औपचारिक दस्तावेज मुहैया नहीं कराया गया. इस दौरान बहुत कुछ हुआ, कुछ को प्रशाशन और बड़े कॉर्पोरेट लॉबी के दखल से तोड़ दिया गया और कुछ आज भी डर के साए में जी रहे हैं. उदहारण के तौर पर, आमू कूड़ा बस्ती, जो पटना एअरपोर्ट से लगभग २ किलोमीटर की दूरी पर है और राष्ट्रीय आलू अनुसन्धान केंद्र के समीप. यहाँ के निवासी और बस्ती से सटे स्कूल की शिक्षिका बताती है कि यहाँ लगभग डोम जाती के 189 घर है और आबादी लगभग 1170. बस्ती के लगभग लोग साफ़-सफाई का काम करते है. स्लम में रहने वाली मंजू देवी कहती है कि यहाँ पर उनके ये तीसरी पीढ़ी है और वो लोग यहाँ लगभग आज़ादी के बाद से ही रह रहे है. बस्ती के नेता मुन्ना बताते हैं कि यहाँ लगभग 84 घर ऐसे हैं जो लालू के मुख्यमंत्री कार्यकाल 1993 में इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत बनाये गए है. किन्तु, आज आमू कूड़ा बस्ती को तहस नहस कर दिया गया है, सारे पक्के मकानों को तोड़ दिया गया है और बच्चे-बूढ़े खुले आसमान के नीचे सोने को विवस है.

बस्ती के लोग बताते है कि बीते 24 अप्रैल को पुलिस का बड़ा दस्ता घरो को तोड़ने के लिए क्रेन के साथ आया. शुरूआती में बस्ती के लोगो और पुलिस के बीच नोंक झोंक हुई और तदोपरान्त लाठी चार्ज किये गए. बस्ती के बहुत सारे पुरुष और महिलाये, उस दिन पुलिस पर खुद को पीटे जाने का आरोप लगाती है. बस्ती में रहने वाले महेश याद करते हैं – उन दिनों उन्हें इंदिरा आवास योजना के तहत उन्हें 14000 रूपये दिए गए थे और बाकि मेहनत-मजदूरी करके घर बनाया था. लेकिन, आज सब सरकार ने तहस नहस कर दिया है और हमलोगों को आगे का रास्ता नहीं दिख रहा है. मंजू कहती है कि अगर सरकार को तोडना ही था, तो हमें मुआवाजा और कही दूसरी जगह विस्थापित करना चाहिए था. क्योंकि, नितीश सरकार ने दलितों को तीन डिसमिल जमीन का वादा किया है.
बहरलाल, प्रशाशन वर्षो पुरानी दलितों के बस्ती को तहस नहस कर दिया है और अभी तक कोई भी सरकारी बाबु और लोकल नेता इनकी पहल लेने नहीं आया. बस्ती के लोग गुस्सा होकर कहते हैं कि यहाँ तक कोई मीडिया भी नहीं आया, जो हमारी बर्बादी और सरकार के बर्बरता को दिखता. लोग ग़मगीन और चिंतित है कि आगे बरसात आने वाली है, बारिश के दिनों में गुजर बसर करना और भी मुश्किल हो जायेगा. लोग कहते है कि अभी तो बस्ती से सटे प्राइमरी स्कूल ही बारिश होने पर हमलोगों का आसरा है क्योंकि जब से बस्ती टूटी है, स्कूल भी नहीं चल रहा है. क्यूंकि, ज्यादातर यही के बच्चे इस स्कूल में पढ़ते थे और स्लम टूटने के बाद बच्चो का स्कूल जाना भी बंद हो गया है.

हालांकि, ये पहला स्लम नहीं है, जिसे तोडा गया है. पिछले साल नालंदा मेडिकल कॉलेज के समीप मीना बाज़ार कूड़ा पर के बस्ती को कड़क ठंढ में तोड़ दिया गया था. बस्ती को फिर से स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे वीरेन्द्र ठाकुर कहते हैं कि इस बस्ती को यही बसाने के लिए लगभग 600 करोड़ रुपया भी आवंटित हुआ था, किन्तु बाद में बिना कारण बताये इसे भी तोड़ दिया गया. पटना में ऐसे और भी स्लम है, जिसे तोडा जा रहा है किन्तु इसपर सत्ता पक्ष, विपक्ष और लोकतंत्र का मजबूत खम्भा चुप्पी साधे हुए है. हालांकि, 2011 के स्लम पालिसी, जिसमे सरकार ने मुख्य और कीमती जगहों पर बसे झुग्गियों को शहर के पेरीफेरी में बसाने का प्रस्ताव लाया था, विरोध के बाद ठंढे बसते में डाल दिया. किन्तु, उसी काम को अब सरकार दुसरे तरीके से कर रही है. अगर ऐसा ही रहा तो बिहार जैसे प्रदेश में सामाजिक न्याय एक जूमला रह जाएगा और गरीब और दलित धीरे धीरे हासिये तक खिसका दिए जायेंगे.
सुजीत कुमार, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं.









